नई दिल्ली देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी नाबालिग के पायजामे का नाड़ा खींचना और स्तन छूना दुष्कर्म की कोशिश की श्रेणी में आता है। अदालत ने कहा कि ऐसे कृत्य को केवल “तैयारी” नहीं माना जा सकता, बल्कि यह स्पष्ट रूप से दुष्कर्म के प्रयास को दर्शाता है। इस फैसले के साथ ही कोर्ट ने Allahabad High Court के उस विवादित आदेश को पलट दिया, जिसमें इसे महज दुष्कर्म की तैयारी बताया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई की। 10 फरवरी को पारित अपने आदेश में अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय का निर्णय आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों की गलत व्याख्या पर आधारित था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपों की प्रकृति और घटनाक्रम को देखते हुए यह मानने का कोई आधार नहीं है कि आरोपी केवल तैयारी कर रहे थे, बल्कि उनके कृत्य से दुष्कर्म की कोशिश का स्पष्ट इरादा झलकता है।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि इस तरह के मामलों में संवेदनशील और यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। पीठ ने अपने फैसले में कहा कि आरोपों को सतही रूप से नहीं देखा जा सकता। यदि कोई व्यक्ति नाबालिग के कपड़े उतारने या उसके निजी अंगों को छूने की कोशिश करता है, तो इसे केवल तैयारी नहीं कहा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट नेयौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) के तहत लगाए गए सख्त आरोपों को भी बहाल कर दिया। अदालत ने विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो), कासगंज द्वारा 23 जून 2023 को पारित समन आदेश को पुनर्स्थापित करते हुए कहा कि आरोपियों के खिलाफ दुष्कर्म की कोशिश के आरोपों पर विधिसम्मत सुनवाई जारी रहेगी।

मामले के अनुसार, 10 नवंबर 2021 को एक महिला ने शिकायत दर्ज कराई थी कि गांव के तीन युवकों ने उसकी 14 वर्षीय बेटी को मोटरसाइकिल से घर छोड़ने का प्रस्ताव दिया और रास्ते में उससे छेड़छाड़ की। शिकायत में आरोप था कि आरोपियों ने नाबालिग का पायजामा खींचा और उसके साथ अभद्र हरकत की। बच्ची के चिल्लाने पर दो लोग मौके पर पहुंचे, जिसके बाद आरोपी फरार हो गए।

शीर्ष अदालत के इस फैसले को बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है। न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि नाबालिगों के साथ किसी भी प्रकार की यौन प्रकृति की जबरन हरकत को हल्के में नहीं लिया जाएगा। यह निर्णय न केवल कानूनी दृष्टि से अहम है, बल्कि समाज में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के प्रति न्यायपालिका की सख्त प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।

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