20 फरवरी से पहले 14 जिलाध्यक्ष घोषित होंगे
लखनऊ। लोकसभा चुनाव में पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण के प्रभाव से सबक लेते हुए भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में बड़े संगठनात्मक बदलाव की तैयारी में है। पार्टी संगठनात्मक जिलों में नई टीमों के गठन की रूपरेखा पर काम कर रही है। सूत्रों के मुताबिक 20 फरवरी से पहले 14 जिलाध्यक्षों की घोषणा की जाएगी, जिसके बाद चरणबद्ध तरीके से सभी जिलों में नई इकाइयों का गठन होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, लोकसभा चुनाव में पीडीए रणनीति को आगे बढ़ाने वाली समाजवादी पार्टी की चालों को देखते हुए भाजपा अब संगठन स्तर पर जातीय संतुलन साधने की रणनीति पर जोर दे रही है। पार्टी का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए अभी से सामाजिक समीकरण मजबूत करना आवश्यक है।
प्रदेश स्तर पर बैठकों का दौर जारी है और जिलों से जमीनी फीडबैक जुटाने के लिए पर्यवेक्षक भेजने की तैयारी है। यदि पर्यवेक्षकों की नियुक्ति में देरी होती है तो जिला प्रभारियों से इनपुट लेकर प्रदेश इकाई सीधे जिला टीमों की घोषणा कर सकती है। चर्चा है कि होली तक जिला संगठन का गठन कर लिया जाएगा और उसके बाद क्षेत्रीय टीमों का विस्तार होगा।
भाजपा की रणनीति में विभिन्न क्षेत्रों के जातीय समीकरणों को ध्यान में रखा जा रहा है। प्रयागराज मंडल और आसपास के जिलों में निषाद, यादव और मल्लाह समुदाय, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सैनी, पाल और प्रजापति, पूर्वांचल में यादव और कुशवाहा, काशी क्षेत्र में मौर्य तथा अवध क्षेत्र में कुर्मी और पासी वर्ग के प्रतिनिधित्व पर विचार हो सकता है। ब्रज क्षेत्र के कई जिलों में लोध समुदाय की मजबूत उपस्थिति को देखते हुए संगठन में उन्हें वरीयता मिलने की संभावना जताई जा रही है।
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव 2027 के चुनाव में पारंपरिक यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़कर सवर्ण और अन्य ओबीसी वर्गों को अधिक प्रतिनिधित्व दे सकते हैं। इसकी काट के तौर पर भाजपा कुछ जिलों में यादव चेहरों को संगठन में प्रमुख जिम्मेदारी दे सकती है।
हाल के दिनों में महोबा के भाजपा विधायक बृजभूषण राजपूत और कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र देव सिंह के बीच विवाद के बाद लोध नेताओं की सक्रियता ने भी पार्टी को सामाजिक संतुलन पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया है। वहीं कुशीनगर में ब्राह्मण विधायकों की बैठक के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल बढ़ी थी। बसपा और सपा द्वारा ब्राह्मण समुदाय को साधने की कोशिशों के बीच भाजपा अपने इस पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत बनाए रखने के लिए जिला इकाइयों में ब्राह्मण चेहरों को प्रमुखता दे सकती है।
उधर, मायावती की बढ़ती सक्रियता को देखते हुए भाजपा दलित समाज को साधने की रणनीति भी तेज कर रही है। प्रदेश अनुसूचित मोर्चा दलित महापुरुषों के नाम पर विशेष कैलेंडर जारी करने की तैयारी में है और संगठन में दलित प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर भी मंथन चल रहा है।
कुल मिलाकर भाजपा संगठनात्मक स्तर पर व्यापक फेरबदल के जरिए सामाजिक समीकरणों को साधने और विपक्ष की रणनीति का जवाब देने की तैयारी में है। आने वाले दिनों में जिलाध्यक्षों की घोषणाओं के साथ प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण स्पष्ट होते नजर आ सकते हैं।





