दुष्कर्म का मामला किया खारिज, कहा :स्वेच्छा से बने संबंध को नहीं माना जा सकता अपराध

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नीरज कुमार के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म के मामले को निरस्त करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि यदि वयस्क महिला ने स्वेच्छा से संबंध बनाए हों, तो उसे दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने पाया कि मामले में शिकायत दर्ज कराने में असामान्य देरी, पीड़िता के बयानों में विरोधाभास तथा उपलब्ध डिजिटल साक्ष्य अभियोजन की कहानी पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं।
न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार, पीड़िता ने घटना के लगभग एक वर्ष तीन माह बाद शिकायत दर्ज कराई। इस अवधि में किसी प्रकार की आपत्ति या दबाव की शिकायत सामने नहीं आई। कोर्ट ने कहा कि इतनी लंबी देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड पर प्रस्तुत व्हाट्सएप चैट और अन्य डिजिटल संवादों से दोनों के बीच घनिष्ठ संबंधों का संकेत मिला। अदालत ने टिप्पणी की कि प्रारंभिक बयान में पीड़िता ने आरोपित के साथ संबंध स्वीकार किए थे, जबकि बाद के बयान में उसने दबाव की बात कही। इस विरोधाभास को न्यायालय ने महत्वपूर्ण माना।
पीठ ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सहमति और असहमति के प्रश्न का परीक्षण परिस्थितियों, आचरण और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल संबंध टूटने या आपसी मतभेद के बाद लगाए गए आरोपों को स्वतः दुष्कर्म नहीं माना जा सकता, जब तक कि स्पष्ट रूप से जबरन या धोखे का प्रमाण न हो।
अदालत ने कहा कि आपराधिक कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और प्रत्येक मामले में तथ्यों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। इसी आधार पर न्यायालय ने नीरज कुमार के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया। यह निर्णय सहमति की कानूनी व्याख्या और आपराधिक मामलों में साक्ष्यों के महत्व को रेखांकित करने वाला माना जा रहा है।

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