सामाजिक न्याय के प्रहरी, सादगी और सिद्धांतों की राजनीति के प्रतीक
भरत चतुर्वेदी
महान स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर समाजवादी चिंतक और ‘भारत रत्न’ से अलंकृत जननायक कर्पूरी ठाकुर जी की पुण्यतिथि पर राष्ट्र उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि सामाजिक चेतना के जागरण पुरुष थे—ऐसे जननायक, जिन्होंने राजनीति को सत्ता का साधन नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का माध्यम बनाया।
कर्पूरी ठाकुर जी का जीवन संघर्षों से भरा रहा। अत्यंत साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी की और जेल यात्राएं भी कीं। स्वतंत्रता के बाद भी उनका संघर्ष समाप्त नहीं हुआ; बल्कि उन्होंने सामाजिक विषमताओं के विरुद्ध अपनी वैचारिक लड़ाई को और धार दी।
उनकी राजनीति का केंद्र बिंदु था—समान अवसर, सामाजिक न्याय और वंचितों का सशक्तिकरण। वे मानते थे कि लोकतंत्र तभी सार्थक है जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी विकास की मुख्यधारा से जुड़ सके।
मुख्यमंत्री के रूप में उनका सबसे ऐतिहासिक निर्णय पिछड़े वर्गों को आरक्षण प्रदान करना था। यह कदम केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति की शुरुआत था। उस समय इस निर्णय का तीखा विरोध भी हुआ, लेकिन कर्पूरी जी अपने सिद्धांतों से डिगे नहीं।
उन्होंने यह सिद्ध किया कि राजनीति में साहस और नैतिक दृढ़ता ही वास्तविक नेतृत्व की पहचान है। आज देश में सामाजिक न्याय की जो अवधारणा व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है, उसकी मजबूत नींव रखने वालों में कर्पूरी ठाकुर जी अग्रणी रहे।
महिलाओं और वंचितों के लिए समर्पित जीवन
कर्पूरी जी ने महिलाओं की शिक्षा और भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना। उनका मानना था कि आधी आबादी को सशक्त किए बिना समाज का संतुलित विकास संभव नहीं है। पिछड़े, दलित और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए उन्होंने नीतिगत पहल कर उन्हें सम्मान और अवसर दिलाने का प्रयास किया।
सादगी और शुचिता की मिसाल
राजनीतिक जीवन में सादगी उनकी पहचान थी। वे उच्च पदों पर रहे, लेकिन जीवनशैली में विनम्रता और पारदर्शिता कायम रही। उनके व्यक्तित्व में सत्ता का अहंकार नहीं, बल्कि सेवा का भाव दिखाई देता था।
आज जब राजनीति में नैतिकता और मूल्य आधारित आचरण की चर्चा होती है, तब कर्पूरी ठाकुर जी का जीवन आदर्श के रूप में सामने आता है। उन्होंने सिद्ध किया कि जननेता वही है जो जनता के बीच रहे, उनकी भाषा बोले और उनके दुख-दर्द को अपना माने।
आज के परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिकता
वर्तमान समय में सामाजिक समरसता, समावेशी विकास और पारदर्शी शासन की जो आवश्यकता महसूस की जा रही है, वह कर्पूरी जी की विचारधारा को और अधिक प्रासंगिक बनाती है। उनकी राजनीति व्यक्तिवाद पर नहीं, बल्कि समाजवाद और सामूहिक उत्थान पर आधारित थी।
उनकी पुण्यतिथि केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी क्षण है—क्या हम उनके आदर्शों पर चल पा रहे हैं? क्या हमारी नीतियां वास्तव में अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंच रही हैं?
राष्ट्र को प्रेरित करती रहेगी विरासत
कर्पूरी ठाकुर जी का जीवन संघर्ष, त्याग और सिद्धांतों की एक ऐसी गाथा है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। सामाजिक न्याय, समावेशी विकास और मूल्यों पर आधारित राजनीति के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता हम सभी के लिए मार्गदर्शक है।
उनकी पुण्यतिथि पर हम संकल्प लें कि लोकतंत्र की आत्मा—समानता, न्याय और सेवा—को मजबूत करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहेंगे।

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