फर्रुखाबाद जनपद इन दिनों एक ऐसे विवाद से गुजर रहा है, जिसने न केवल प्रशासनिक हलकों बल्कि न्यायिक और मीडिया जगत को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। सवाल यह है कि क्या आईजीआरएस जैसी पारदर्शी जन शिकायत प्रणाली को कुछ लोग अपने निजी एजेंडे और दुष्प्रचार के औजार में बदलने का प्रयास कर रहे हैं?
चर्चा के केंद्र में एक ऐसा नाम है, जिस पर पहले से कई आपराधिक मुकदमे दर्ज होने की बात कही जा रही है। सूत्रों के अनुसार संबंधित व्यक्ति के खिलाफ जनपद और आसपास के क्षेत्रों में लगभग दस मुकदमे दर्ज बताए जाते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि इन मुकदमों में गंभीर धाराएं शामिल हैं। यद्यपि इन तथ्यों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभागों द्वारा ही की जा सकती है, लेकिन यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि किसी व्यक्ति का स्वयं का आपराधिक रिकॉर्ड विवादित हो, तो उसके द्वारा लगातार उच्चाधिकारियों और प्रतिष्ठित वर्गों पर लगाए जा रहे आरोपों की मंशा क्या है?
आईजीआरएस पोर्टल का उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान करना है। यह मंच नागरिकों को प्रशासन तक अपनी शिकायत पहुँचाने का संवैधानिक अधिकार देता है। लेकिन जब इसी मंच का उपयोग बार-बार एक ही पैटर्न में उच्चाधिकारियों, पुलिस कर्मियों, अधिवक्ताओं और पत्रकारों की छवि धूमिल करने के लिए किया जाए, तो यह चिंता का विषय बन जाता है।
प्रशासनिक सूत्रों का संकेत है कि कुछ शिकायतें तथ्यों की जांच के बाद निराधार पाई गईं। यदि यह सही है, तो यह केवल व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का मामला नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर आघात है। झूठे या भ्रामक आरोपों की पुनरावृत्ति किसी भी संस्थागत ढांचे को अस्थिर करने का माध्यम बन सकती है।
एक और गंभीर चर्चा स्थानीय स्तर पर चल रही है—संबंधित व्यक्ति की कथित नजदीकी जनपद के चर्चित माफिया अनुपम दुबे से। यदि यह संबंध वास्तविकता पर आधारित है और शिकायतों का उपयोग किसी आपराधिक नेटवर्क के हितों की रक्षा या दबाव की रणनीति के रूप में किया जा रहा है, तो यह अत्यंत गंभीर विषय है। हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि अभी तक सामने नहीं आई है, लेकिन ऐसी चर्चाएं स्वयं यह संकेत देती हैं कि मामला साधारण नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक प्रभावित वे लोग हैं जिनकी प्रतिष्ठा सार्वजनिक जीवन से जुड़ी है—पुलिस अधीक्षक, अन्य पुलिस अधिकारी, अधिवक्ता और पत्रकार। सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, परंतु निराधार आरोप और व्यवस्थित बदनामी लोकतांत्रिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि अराजकता का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
कानूनी दृष्टि से भी यह प्रश्न महत्वपूर्ण है। भारतीय दंड संहिता और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में झूठी सूचना प्रसारित करने, प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचाने और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के प्रयासों के विरुद्ध स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर मिथ्या शिकायतें करता है, साक्ष्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करता है या दुष्प्रचार के माध्यम से दबाव बनाता है, तो वह स्वयं विधिक कार्रवाई के दायरे में आ सकता है।
हालांकि, इस पूरे मामले में एक संतुलित दृष्टिकोण भी आवश्यक है। यह भी उतना ही सत्य है कि जन शिकायत प्रणाली का अस्तित्व ही इसलिए है ताकि नागरिक निर्भय होकर अपनी बात रख सकें। अतः किसी भी शिकायत को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि शिकायतकर्ता विवादित है। समाधान का एकमात्र रास्ता पारदर्शी, निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि यदि शिकायतें निराधार हैं तो तथ्य सार्वजनिक किए जाएं।
यदि शिकायतों में दम है तो दोषियों पर कठोर कार्रवाई हो।
और यदि शिकायत प्रणाली का दुरुपयोग हो रहा है, तो उसके विरुद्ध उदाहरणात्मक कदम उठाए जाएं।
लोकतंत्र में अधिकार और जवाबदेही दोनों साथ-साथ चलते हैं। आईजीआरएस जैसी व्यवस्था जनता की आवाज है, लेकिन उसे दुष्प्रचार का हथियार बनने देना लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ अन्याय होगा।सच्चाई चाहे जिस पक्ष में हो, उसे सामने आना ही चाहिए—क्योंकि व्यवस्था की विश्वसनीयता ही जनता के विश्वास की आधारशिला है।

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