14 फरवरी 2019—यह तारीख भारतीय इतिहास में एक ऐसे घाव की तरह दर्ज है, जो समय के साथ भरता तो है, पर स्मृति से मिटता नहीं। जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के काफिले पर हुआ आत्मघाती आतंकी हमला केवल एक सुरक्षा चूक या आतंकी वारदात भर नहीं था; वह भारत की सामूहिक चेतना को झकझोर देने वाला क्षण था। इस हमले में 40 जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया और पूरा देश शोक, आक्रोश और दृढ़ संकल्प की त्रयी से गुज़रा।
बरसी के अवसर पर देश के शीर्ष नेतृत्व ने शहीदों को श्रद्धांजलि दी। प्रधानमंत्री Narendra Modi ने उनके साहस और त्याग को राष्ट्र की प्रेरणा बताया, जबकि लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने उनके बलिदान को देश का ऋण कहा। उपराष्ट्रपति C. P. Radhakrishnan ने भी इसे राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के संकल्प को सुदृढ़ करने वाला क्षण बताया। यह राजनीतिक वक्तव्यों से परे वह अवसर है, जब पूरा देश दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर शहीदों को नमन करता है।
एक काफिला, एक विस्फोट, और 40 अधूरे सपने
हमले के दिन 78 वाहनों का काफिला जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर आगे बढ़ रहा था। लगभग 2,500 जवानों के इस काफिले पर विस्फोटकों से लदी एक गाड़ी ने आत्मघाती टक्कर मारी। विस्फोट की तीव्रता इतनी थी कि कई वाहन क्षतिग्रस्त हो गए। आतंकी संगठन Jaish-e-Mohammed ने हमले की जिम्मेदारी ली। इस घटना ने न केवल सुरक्षा ढांचे पर सवाल उठाए, बल्कि सीमा-पार आतंकवाद के मुद्दे को एक बार फिर वैश्विक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया।
यह त्रासदी केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है। उन 40 शहीदों के पीछे परिवार थे—मां-बाप, पत्नियां, बच्चे—जिनके सपने उसी क्षण थम गए। शहीदों की अंतिम यात्राओं में उमड़ा जनसैलाब इस बात का प्रमाण था कि भारत अपने सैनिकों को केवल वर्दी में नहीं देखता; वह उन्हें अपने घर-परिवार का हिस्सा मानता है।
शोक से रणनीतिक जवाब तक
पुलवामा के बाद देशभर में तीव्र आक्रोश था। इसके कुछ ही दिनों बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के भीतर आतंकी ठिकानों पर हवाई कार्रवाई की। यह कार्रवाई केवल सैन्य प्रतिक्रिया नहीं थी; यह उस नीति-परिवर्तन का संकेत भी थी, जिसमें भारत ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद के विरुद्ध वह सीमाओं के पार जाकर भी जवाब देने की क्षमता और इच्छाशक्ति रखता है। इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आतंकवाद के खिलाफ भारत की स्थिति को मजबूती दी।
हालांकि, संपादकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या केवल सैन्य कार्रवाई ही पर्याप्त है? आतंक का मुकाबला बहु-आयामी रणनीति से ही संभव है—खुफिया तंत्र की सुदृढ़ता, स्थानीय सहयोग, तकनीकी निगरानी, काफिलों की आवाजाही के नए प्रोटोकॉल और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति—इन सभी आयामों पर निरंतर सुधार की आवश्यकता है। पुलवामा ने सुरक्षा व्यवस्थाओं की कमजोर कड़ियों की पहचान करने और उन्हें दुरुस्त करने का अवसर भी दिया।
पुलवामा की बरसी हमें यह भी याद दिलाती है कि संकट के समय भारत एकजुट खड़ा होता है। उस दिन धर्म, जाति, भाषा और राजनीति के भेद गौण हो गए थे। देश के कोने-कोने में कैंडल मार्च निकले, स्कूलों में श्रद्धांजलि सभाएं हुईं और सोशल मीडिया पर शहीदों के प्रति सम्मान उमड़ा। यह एकता ही भारत की सबसे बड़ी शक्ति है।
लेकिन समय बीतने के साथ भावनाओं की तीव्रता कम हो जाती है। यही वह बिंदु है जहां हमें आत्ममंथन करना चाहिए। क्या हम शहीदों को केवल बरसी के दिन याद करते हैं? या उनके परिवारों के दीर्घकालिक पुनर्वास, बच्चों की शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा को भी उतनी ही प्राथमिकता देते हैं? सच्ची श्रद्धांजलि केवल शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत और सामाजिक संकल्प से दी जाती है।
‘ब्लैक डे’ या राष्ट्रीय संकल्प दिवस?
14 फरवरी को कई लोग ‘ब्लैक डे’ के रूप में याद करते हैं। निस्संदेह यह शोक का दिन है, परंतु इसे केवल अंधकार के प्रतीक तक सीमित कर देना पर्याप्त नहीं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता और सुरक्षा की कीमत चुकानी पड़ती है। यह दिन हमें चेताता है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लंबी है और इसमें केवल सैनिक ही नहीं, बल्कि नागरिक समाज, मीडिया और राजनीतिक नेतृत्व—सभी की जिम्मेदारी है।
पुलवामा केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी और एक प्रेरणा दोनों है। चेतावनी इसलिए कि सुरक्षा के मोर्चे पर शिथिलता की कोई गुंजाइश नहीं; प्रेरणा इसलिए कि हमारे जवान विपरीत परिस्थितियों में भी राष्ट्र-रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं।
जब हम शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं, तो वह श्रद्धांजलि तभी सार्थक होगी जब हम एक सुरक्षित, एकजुट और जागरूक भारत के निर्माण में अपना योगदान दें। उनके बलिदान को शब्दों में बांधना संभव नहीं, पर उसे कर्म में उतारना अवश्य संभव है।
पुलवामा के शहीदों की स्मृति में झुका हुआ हर सिर, दरअसल उस संकल्प का प्रतीक है कि आतंक के आगे भारत कभी झुकेगा नहीं। यही इस बरसी का सबसे बड़ा संदेश है—शोक से शक्ति की ओर, और स्मृति से संकल्प की ओर।
पुलवामा: शोक से संकल्प तक — राष्ट्रीय चेतना में अंकित एक त्रासदी


