कन्नौज। विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही समाजवादी पार्टी की जिला इकाई अंदरूनी खींचतान के कारण सुर्खियों में है। सदर, छिबरामऊ और तिर्वा—तीनों सीटों पर टिकट को लेकर चल रही रस्साकशी अब खुले टकराव में बदलती दिख रही है। रणनीति बैठकों का एजेंडा जहां चुनावी तैयारी होना चाहिए, वहां आरोप-प्रत्यारोप और बयानबाजी हावी है।
सदर सीट पर पुराने दावेदारों और नए चेहरों के समर्थकों के बीच तनातनी ने संगठनात्मक संतुलन को प्रभावित किया है। छिबरामऊ में स्थानीय स्तर पर दो प्रमुख खेमों की सार्वजनिक बयानबाजी ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। तिर्वा में भी गुटबाजी सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक दिखाई दे रही है। कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा बन रही है कि टिकट की दौड़ में हर गुट खुद को अंतिम दावेदार मानकर प्रचार में जुटा है, जिससे सामूहिक रणनीति कमजोर पड़ रही है।
हाईकमान द्वारा अधिकृत जिला प्रवक्ता तय होने के बावजूद कई स्थानीय नेता स्वयं को ‘आधिकारिक आवाज’ के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। पार्टी लाइन से अलग-अलग व्यक्तिगत लाइनें चलने लगी हैं। सियासी गलियारों में मीडिया मैनेजमेंट और ‘तय सवालों’ की चर्चाएं भी गर्म हैं। हालिया कार्यक्रमों में प्रेस वार्ताओं को लेकर उठी फुसफुसाहटों ने संगठन के भीतर अविश्वास की परतें और गहरी कर दी हैं।
जिला नेतृत्व की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ कार्यकर्ता आरोप लगा रहे हैं कि आर्थिक रूप से सक्षम चेहरे अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं, जबकि पुराने कार्यकर्ताओं की भूमिका सीमित होती जा रही है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन चर्चाओं ने संगठनात्मक अनुशासन की जगह निजी समीकरणों को प्रमुखता दे दी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते शीर्ष नेतृत्व ने हस्तक्षेप नहीं किया तो इसका असर बूथ मैनेजमेंट, कार्यकर्ता समन्वय और मतदाता संपर्क अभियान पर पड़ सकता है। चुनावी रणनीति का केंद्र बिंदु जहां जनता के मुद्दे होने चाहिए, वहां आंतरिक कलह सुर्खियां बटोर रही है।
विपक्षी दल इस स्थिति को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश में हैं और ‘अंदरूनी महाभारत’ को चुनावी हथियार की तरह पेश कर रहे हैं। अब सबकी निगाह इस बात पर है कि पार्टी नेतृत्व किस तरह गुटों को साधता है, अधिकृत लाइन को मजबूत करता है और संगठन को एकजुट कर चुनावी रणभूमि में उतारता है।
कन्नौज की तीनों सीटों पर टिकट की जंग का यह अध्याय आने वाले दिनों में किस दिशा में जाएगा, यही तय करेगा कि यह ‘महाभारत’ सपा के लिए चुनौती साबित होगा या संगठनात्मक पुनर्गठन का अवसर।


