रवि शर्मा
आज की भागती-दौड़ती दुनिया में जहाँ तकनीक और भौतिकवाद का बोलबाला है, हम अक्सर अपनी जड़ों को भूल जाते हैं। अक्सर यह सवाल उठता है कि दुनिया का सबसे बड़ा धर्म कौन सा है? इसका सरल और सबसे सटीक उत्तर है
मानवता का अर्थ केवल इंसान के रूप में जन्म लेना नहीं है, बल्कि दूसरों के प्रति करुणा, प्रेम, सहानुभूति और सेवा का भाव रखना है। जब हम किसी अनजान व्यक्ति के दुख को देखकर विचलित होते हैं और बिना किसी स्वार्थ के उसकी मदद के लिए हाथ बढ़ाते हैं, वही असल में मानवता है।
दुनिया के अन्य सभी धर्म हमें किसी न किसी समुदाय या पहचान से जोड़ते हैं, लेकिन मानवता हमें ‘एक वैश्विक परिवार’ के रूप में जोड़ती है। यह रंग, जाति, देश और धर्म की सीमाओं को नहीं मानता।
दुनिया में होने वाले अधिकांश संघर्ष वैचारिक मतभेदों के कारण होते हैं। यदि हर व्यक्ति ‘इंसानियत’ को प्राथमिकता दे, तो घृणा और हिंसा की कोई जगह नहीं बचेगी।
लगभग हर धर्म कहता है कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त है। यदि हम उसकी बनाई रचना (मनुष्यों और प्राणियों) का सम्मान नहीं कर सकते, तो मंदिर या मस्जिद में की गई इबादत बेमानी है।
“किसी भूखे को खाना खिलाना या किसी गिरते हुए को सहारा देना, हजार मालाएं जपने से कहीं अधिक पुण्यकारी है।”
आज समाज में बढ़ती असहिष्णुता और स्वार्थ के बीच मानवता की लौ को जलाए रखना अनिवार्य हो गया है। प्राकृतिक आपदाएं हों या वैश्विक महामारी, हमने देखा है कि अंततः इंसान ही इंसान के काम आता है। जब कोई रक्त की बूंद किसी की जान बचाती है, तो वह यह नहीं पूछती कि देने वाला किस धर्म का था।
मानवता कोई किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि एक आचरण है। यदि हमारे मन में परोपकार की भावना है, तो हम सबसे बड़े धार्मिक व्यक्ति हैं। हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को केवल डॉक्टर, इंजीनियर या अफसर बनना ही नहीं, बल्कि एक सच्चा इंसान बनना सिखाना चाहिए।

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