लखनऊ। प्रदेश में अप्रैल–मई में प्रस्तावित त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। शासन ने भले ही हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में समय से चुनाव कराने का दावा किया हो, लेकिन जमीनी हकीकत और लंबित प्रक्रियाओं को देखते हुए तय समय पर चुनाव कराना चुनौतीपूर्ण नजर आ रहा है। सबसे बड़ी बाधा समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का अब तक गठन न होना है।
दरअसल, पंचायत चुनाव में सीटों के आरक्षण की प्रक्रिया तय करने के लिए समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन अनिवार्य है। सूत्रों के अनुसार, आयोग के गठन के बाद भी उसे आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया पूरी करने में कम से कम एक से डेढ़ महीने का समय लगेगा। ऐसे में अप्रैल–मई में चुनाव कराना व्यवहारिक रूप से कठिन माना जा रहा है।
प्रदेश के पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने पूर्व में समयानुसार चुनाव कराने की बात कही थी, लेकिन तैयारियों की मौजूदा स्थिति इस दावे पर सवाल खड़े कर रही है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि आयोग का गठन शीघ्र भी कर दिया जाए, तब भी चुनाव कार्यक्रम में एक से दो महीने की देरी संभावित है।
पंचायती राज विभाग के अनुसार, 12 जनवरी को निदेशक पंचायती राज की ओर से हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर जवाब देते हुए हलफनामा दाखिल किया गया था। इसमें बताया गया कि समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की पत्रावली शासन को भेज दी गई है और शीघ्र निर्णय की संभावना है। हालांकि, हलफनामे में चुनाव की तिथियों को लेकर कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया, जिससे समयबद्ध चुनाव पर संशय और गहरा गया है।
आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया भी जटिल मानी जा रही है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी 20.6982 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति की आबादी 0.5677 प्रतिशत है। पंचायत चुनाव में इन वर्गों के लिए इसी अनुपात में सीटें आरक्षित करनी होंगी। वहीं अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का प्रतिशत जनगणना 2011 में अलग से दर्ज नहीं था। वर्ष 2015 के रैपिड सर्वे के अनुसार ग्रामीण आबादी में ओबीसी की हिस्सेदारी 53.33 प्रतिशत बताई गई थी, जिसके आधार पर 2021 के पंचायत चुनाव में आरक्षण तय किया गया था।
इस बार ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य माना जा रहा है, लेकिन जनसंख्या और परिसीमन में संभावित बदलावों को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से गणना और आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया में समय लगना तय है। ऐसे में समय से पंचायत चुनाव कराए जाने को लेकर अभी भी स्थिति स्पष्ट नहीं है और सरकार के सामने कानूनी व प्रशासनिक दोनों स्तर पर बड़ी चुनौती खड़ी है।






