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Thursday, February 12, 2026

फर्रुखाबाद के आलू किसानों की आवाज बनी भारत की संसद

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– सांसद मुकेश राजपूत ने लोकसभा में उठाई “आलू बोर्ड” गठन की मांग
– बोले – समर्थन मूल्य से ही रुकेगा किसानों का नुकसान

नई दिल्ली/फर्रुखाबाद: फर्रुखाबाद लोकसभा (Farrukhabad Lok Sabha) क्षेत्र के सांसद मुकेश राजपूत (MP Mukesh Rajput) ने लोकसभा में जोरदार तरीके से आलू किसानों की आवाज उठाई। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से आलू बोर्ड की स्थापना का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि “जब मसाला बोर्ड, मखाना बोर्ड और अन्य कृषि उत्पादों के लिए विशेष बोर्ड बनाए जा सकते हैं, तो आलू जैसे बड़े उत्पाद के लिए अलग बोर्ड क्यों नहीं?”

सांसद ने कहा कि आलू “सब्जियों का राजा” है और फर्रुखाबाद सहित आसपास के लोकसभा क्षेत्रों में आलू का उत्पादन देश में अग्रणी है। इसके बावजूद किसानों को अक्सर लागत से कम दाम पर फसल बेचने को मजबूर होना पड़ता है।

मुकेश राजपूत ने स्पष्ट कहा कि आलू बोर्ड के गठन से
आलू के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय किया जा सकेगा
भंडारण और निर्यात की ठोस नीति बनेगी,
कोल्ड स्टोरेज की समस्याओं का समाधान होगा,
बिचौलिया तंत्र पर लगाम लगेगी
किसानों को घाटे से राहत मिलेगी

उन्होंने तर्क दिया कि आलू उत्पादन में अग्रणी जिलों – खासकर फर्रुखाबाद, कन्नौज, मैनपुरी,एटा, इटावा आगरा, कासगंज, कानपुर और आसपास के क्षेत्रों – में हर वर्ष कीमतों के उतार-चढ़ाव से किसान परेशान रहते हैं। कई बार आलू की कीमत इतनी गिर जाती है कि किसान लागत भी नहीं निकाल पाते।
सांसद ने कहा कि क्षेत्र में रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद किसानों की आय स्थिर नहीं है। फसल की बंपर पैदावार के बाद बाजार में कीमतें गिर जाती हैं और किसान कर्ज के बोझ में दब जाते हैं।

उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि जिस तरह विशेष फसलों के लिए अलग-अलग बोर्ड बनाए गए हैं, उसी तर्ज पर आलू बोर्ड का गठन कर इसे संगठित और संरक्षित बाजार दिया जाए। लोकसभा में उठी इस मांग के बाद फर्रुखाबाद और आसपास के आलू उत्पादक किसानों में नई उम्मीद जगी है। किसान संगठनों का कहना है कि यदि आलू बोर्ड बना और एमएसपी लागू हुआ तो यह क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि आलू प्रोसेसिंग, चिप्स-फ्रेंच फ्राइज उद्योग, स्टार्च उद्योग और निर्यात को बढ़ावा देकर लाखों किसानों को स्थायी लाभ दिया जा सकता है। सवाल यह है कि क्या केंद्र सरकार इस प्रस्ताव पर ठोस कदम उठाएगी? यदि आलू बोर्ड की स्थापना होती है तो यह न सिर्फ फर्रुखाबाद बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के आलू किसानों के लिए ऐतिहासिक फैसला साबित हो सकता है।फिलहाल, संसद में उठी यह आवाज जिले और आसपास के जनपदों के किसानों के लिए राहत की किरण बनकर उभरी है।

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