शरद कटियार
उत्तर प्रदेश का 9.12 लाख करोड़ रुपये का बजट सिर्फ एक वित्तीय दस्तावेज नहीं है, बल्कि राजनीतिक दृष्टि, आर्थिक दावों और विकास की दिशा का सार्वजनिक ऐलान भी है। सरकार ने इसे विकास, रोजगार और बुनियादी ढांचे का बजट बताया है। आंकड़े प्रभावशाली हैं—प्रति व्यक्ति आय 1,09,844 रुपये, अगले वर्ष 1.20 लाख का अनुमान, 6 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का दावा, बेरोजगारी दर 2.24 प्रतिशत।
लेकिन सवाल यह है कि क्या आंकड़ों की यह चमक आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी में भी उतनी ही दिखाई देती है?
बजट में साफ दिखता है कि सरकार ने दो मोर्चों पर समानांतर रणनीति अपनाई है—एक तरफ सड़क, सेतु, एक्सप्रेस-वे, एयरपोर्ट, औद्योगिक कॉरिडोर; दूसरी तरफ आईटी, एआई मिशन, डेटा सेंटर पार्क और मोबाइल निर्माण जैसे हाई-टेक सेक्टर।
सड़कों और सेतुओं के लिए 34,468 करोड़ रुपये, ऊर्जा क्षेत्र के लिए 65,926 करोड़ रुपये, हरित ऊर्जा के लिए 2,104 करोड़ रुपये और आईटी-इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए 2,059 करोड़ रुपये का प्रावधान यह बताता है कि सरकार दीर्घकालिक पूंजी निवेश को प्राथमिकता दे रही है।
यह मॉडल आर्थिक दृष्टि से गलत नहीं है। मजबूत कनेक्टिविटी और ऊर्जा आपूर्ति उद्योगों को आकर्षित करती है। नोएडा-ग्रेटर नोएडा में मोबाइल फोन निर्माण का हब बनना इसी नीति का परिणाम माना जा रहा है। यदि राज्य देश के 65 प्रतिशत मोबाइल उत्पादन का केंद्र बन चुका है, तो यह निश्चित रूप से औद्योगिक बदलाव का संकेत है।
लेकिन सवाल फिर वही—क्या यह विकास प्रदेश के हर जिले, हर युवा और हर किसान तक समान रूप से पहुंच रहा है?
बेरोजगारी दर 2.24 प्रतिशत बताई जा रही है। मनरेगा के तहत 20 करोड़ मानव दिवस सृजन का दावा है। पुलिस और शिक्षकों की भर्ती का उल्लेख भी किया गया है।
परंतु रोजगार की गुणवत्ता पर चर्चा कम है।
क्या तकनीकी और इंजीनियरिंग युवाओं को उनके कौशल के अनुरूप अवसर मिल रहे हैं?
क्या स्वरोजगार योजनाएं बैंक ऋण से आगे बढ़कर टिकाऊ उद्यम बना पा रही हैं?
यदि रोजगार सिर्फ संख्या तक सीमित रह जाए और आय स्थिर न हो, तो आर्थिक विकास का लाभ अधूरा रह जाता है।
सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के लिए 18,290 करोड़ रुपये का प्रावधान निश्चित रूप से बड़ा कदम है। 4.49 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता, नलकूपों का निर्माण और बाढ़ परियोजनाएं—ये सब कागज पर प्रभावी लगते हैं।
गन्ना भुगतान, मुफ्त बिजली और फसल बीमा का भी उल्लेख है।
लेकिन किसान की असली चिंता लागत और लाभ के अंतर की है।
डीजल, खाद, बीज, मजदूरी—इन सबकी बढ़ती लागत के बीच समर्थन मूल्य और बाजार मूल्य का संतुलन कितना व्यावहारिक है?
यदि परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं और भुगतान में देरी नहीं होती, तभी किसान को वास्तविक राहत मिलेगी।
22,000 मेगावाट हरित ऊर्जा का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है। सोलर सिटी, सीबीजी संयंत्र और ग्रीन हाइड्रोजन सेंटर—ये संकेत देते हैं कि सरकार भविष्य की ऊर्जा अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना चाहती है।
साथ ही नए शहरों और आवासीय योजनाओं का विस्तार यह दर्शाता है कि शहरीकरण को विकास का इंजन माना जा रहा है।
परंतु शहरी विस्तार के साथ जल, स्वच्छता, प्रदूषण और रोजगार संतुलन की चुनौतियां भी आती हैं। नियोजन यदि समावेशी नहीं हुआ, तो अनियोजित शहरीकरण नई समस्याएं खड़ी कर सकता है।
एक ओर एआई मिशन, डेटा सेंटर पार्क और साइबर सुरक्षा केंद्र की घोषणाएं हैं, तो दूसरी ओर खादी, ग्रामोद्योग, माटीकला और कंबल उत्पादन केंद्र के आधुनिकीकरण की योजनाएं।
यह संतुलन सकारात्मक है।
यदि हाई-टेक सेक्टर और पारंपरिक उद्योग दोनों साथ बढ़ते हैं, तो विकास अधिक व्यापक होगा।
लेकिन इन योजनाओं का प्रभाव तभी दिखेगा जब प्रशिक्षण, बाजार और वित्तीय सहायता का तंत्र पारदर्शी और सरल होगा।
विधानसभा परिसर में विपक्ष का प्रदर्शन यह संकेत देता है कि आंकड़ों और दावों पर राजनीतिक बहस जारी रहेगी। लोकतंत्र में यह आवश्यक भी है। बजट केवल तालियों का विषय नहीं होना चाहिए; उसकी आलोचनात्मक समीक्षा भी उतनी ही जरूरी है।

2026-27 का बजट आकार में बड़ा है, दृष्टि में महत्वाकांक्षी है और दावों में प्रभावशाली है।
परंतु असली सवाल तीन हैं
क्या आवंटित धन समय पर खर्च होगा?क्या योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा?
क्या रोजगार और आय में वास्तविक, स्थायी सुधार दिखाई देगा?विकास का मूल्यांकन आंकड़ों से नहीं, लोगों के जीवन स्तर से होता है।अब निगाहें घोषणाओं पर नहीं, क्रियान्वयन पर हैं। यही इस बजट की असली परीक्षा होगी।

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