सूर्या अग्निहोत्री
(डिप्टी एडिटर, यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप)

“चेतावनी दिखाना आसान है,
लेकिन बिक्री पर नियंत्रण ही असली जिम्मेदारी है।”

गर सिगरेट जानलेवा है—और यह बात सरकार, मेडिकल साइंस और कानून तीनों बिना किसी संदेह के मानते हैं—तो फिर यह सवाल केवल जायज़ ही नहीं, बल्कि अनिवार्य हो जाता है कि वह आज भी हर गली-मोहल्ले की दुकान पर टॉफियों, बिस्कुटों और बच्चों के सामानों के बीच खुलेआम क्यों बिक रही है? क्या किसी भी जिम्मेदार राज्य में ज़हर को मिठास के साथ परोसने की इजाज़त दी जा सकती है? और अगर नहीं, तो सिगरेट के मामले में यह नैतिक ढील आखिर क्यों?
सरकार ने सिगरेट के पैकेट पर कैंसरग्रस्त फेफड़ों की तस्वीरें छाप दी हैं, टीवी चैनलों पर चेतावनी भरे विज्ञापन चलवा दिए हैं और शहरों-गांवों की दीवारों पर पोस्टर टंगवा दिए हैं। लेकिन एक बुनियादी सवाल अब भी खड़ा है—क्या सिर्फ विज्ञापन दिखा देना और चेतावनी लिख देना ही राज्य की पूरी जिम्मेदारी है? अगर ऐसा होता, तो फिर सड़क पर हेलमेट न पहनने पर चालान क्यों, शराब पीकर वाहन चलाने पर जेल क्यों और मिलावटी खाद्य पदार्थ बेचने पर दुकान सील क्यों की जाती है?
दरअसल, जागरूकता को जिम्मेदारी का विकल्प बना देना ही सरकार की सबसे बड़ी चूक है। जागरूकता तो जिम्मेदारी का पहला और सबसे आसान कदम है। असली जिम्मेदारी तब शुरू होती है, जब राज्य यह तय करता है कि कोई घातक उत्पाद समाज में कैसे और कितनी आसानी से उपलब्ध होगा। जब सिगरेट स्कूल से लौटते बच्चों की आँखों की सीध में, टॉफियों के ठीक पास रखी जाती है, तब पैकेट पर छपी चेतावनियाँ सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाती हैं।
भारत में तंबाकू की लत अक्सर किसी “स्वतंत्र और समझदारी भरे निर्णय” से शुरू नहीं होती, बल्कि आसान उपलब्धता से जन्म लेती है। खुले सिगरेट की बिक्री, उम्र पूछे बिना बिक्री और हर दस कदम पर दुकान—यह सब मिलकर सिगरेट को खतरनाक नहीं, बल्कि सामान्य बना देता है। और जब कोई घातक आदत सामान्य हो जाए, तो समाज उसे चुनौती देना ही छोड़ देता है। यह स्थिति सिर्फ सामाजिक विफलता नहीं, बल्कि नीतिगत अपराध है।
यहाँ एक और असहज सवाल खड़ा होता है। जब शराब जैसी हानिकारक वस्तु के लिए लाइसेंस, सीमित दुकानें, तय समय और सख्त नियम बनाए जा सकते हैं, तो सिगरेट के लिए क्यों नहीं? क्या फेफड़ों का कैंसर कम जानलेवा है? क्या तंबाकू से होने वाली मौतें सरकार की प्राथमिकता सूची में नीचे आती हैं? या फिर तंबाकू से मिलने वाला कर-राजस्व इतना महत्वपूर्ण है कि नागरिकों की सेहत उसके आगे गौण हो जाती है?
सरकार बार-बार तंबाकू उद्योग से मिलने वाले राजस्व का हवाला देती है, लेकिन वह यह नहीं बताती कि तंबाकू-जनित बीमारियों के इलाज में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर हर साल कितना खर्च आता है। यह भी नहीं बताया जाता कि कितने परिवार समय से पहले अपने कमाने वाले सदस्य को खो देते हैं और कितने लोग इलाज के खर्च में कर्ज़ और गरीबी के दलदल में धकेल दिए जाते हैं। अधूरी सच्चाई कई बार झूठ से भी ज्यादा खतरनाक होती है।
एक और सवाल जिस पर चुप्पी साध ली जाती है—अगर कल कोई कंपनी खुलेआम ज़हर बेचना शुरू कर दे और पैकेट पर लिख दे कि “सेवन जानलेवा है”, तो क्या सरकार उसे लाइसेंस दे देगी? अगर नहीं, तो फिर सिगरेट को यह विशेष छूट क्यों? क्या सिर्फ इसलिए कि यह ज़हर दशकों से वैध है? क्या आदत बन जाना किसी अपराध को स्वीकार्य बना देता है?
यह बहस सिगरेट पर पूर्ण प्रतिबंध की नहीं है। यह बहस राज्य की नीति, नीयत और नैतिक साहस की है। अगर सरकार सच में चाहती है कि लोग धूम्रपान छोड़ें, तो उसे सिर्फ टीवी स्क्रीन, पोस्टर और नारों तक सीमित नहीं रहना होगा। उसे यह ठोस फैसला लेना होगा कि सिगरेट हर दुकान पर नहीं बिकेगी, बच्चों की पहुँच से दूर रहेगी और इसके व्यापार पर वास्तविक नियंत्रण होगा।
आज सवाल यह नहीं है कि सिगरेट पीना सही है या गलत—यह बहस तो समाज बहुत पहले हार चुका है। असली सवाल यह है कि जब खतरा पूरी तरह स्पष्ट है, तब सरकार बिक्री पर लगाम लगाने से क्यों हिचक रही है? इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कितने विज्ञापन दिखाए गए, बल्कि यह जरूर पूछेगा कि जब ज़िंदगियाँ बचाई जा सकती थीं, तब सत्ता ने क्या किया—और किसके पक्ष में खड़ी रही।

लेखक यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप के डिप्टी एडिटर हैं।

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