भरत चतुर्वेदी
सोशल मीडिया ने बीते एक दशक में संचार की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। आज यह केवल मनोरंजन या व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का मंच नहीं रहा, बल्कि पुलिस जांच, जनसूचना और जनसहयोग का एक प्रभावशाली माध्यम बन चुका है। अपराधियों की पहचान से लेकर गुमशुदा लोगों की तलाश तक, सोशल मीडिया ने कई मामलों में निर्णायक भूमिका निभाई है।
आज जब कोई अपराध होता है, तो पुलिस सोशल मीडिया के जरिए तस्वीरें, वीडियो और सूचनाएं साझा कर आम जनता से सहयोग मांगती है। कई मामलों में वायरल पोस्ट के माध्यम से चंद घंटों में अहम सुराग मिल जाते हैं। गुमशुदा बच्चों और बुजुर्गों की तलाश, अज्ञात शवों की पहचान और फरार अपराधियों की सूचना—इन सभी में सोशल मीडिया ने जांच की गति को तेज किया है।
जनता की भागीदारी ने पुलिस और प्रशासन के बीच की दूरी को भी कम किया है। सही सूचना और समय पर साझा किया गया कंटेंट कई बार अपराधियों की गिरफ्तारी तक पहुंचा है।
लेकिन सोशल मीडिया का दूसरा पक्ष उतना ही खतरनाक और चिंताजनक है। फर्जी खबरें, अधूरी जानकारी और भावनात्मक भाषा में लिखी पोस्ट कई बार भीड़ की मानसिकता को जन्म देती हैं। बिना पुष्टि के वायरल हो रही खबरें न सिर्फ निर्दोष लोगों को शक के घेरे में ला देती हैं, बल्कि कई बार कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन जाती हैं।
अफवाहों के चलते झूठे आरोप, सामाजिक तनाव और यहां तक कि हिंसा की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। एक क्लिक में फैलने वाली गलत सूचना को रोक पाना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि सोशल मीडिया समस्या नहीं है, समस्या है उसका गैर-जिम्मेदाराना उपयोग। अगर हर नागरिक पोस्ट साझा करने से पहले उसकी सच्चाई जांचे, स्रोत को समझे और भावनाओं में बहकर प्रतिक्रिया न दे, तो अफवाहों पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है।
पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे केवल पुष्ट और आधिकारिक जानकारी ही साझा करें, ताकि जनता भ्रमित न हो। साथ ही प्लेटफॉर्म्स को भी फर्जी खबरों के खिलाफ सख्त कदम उठाने होंगे।
आज की सबसे बड़ी जरूरत है डिजिटल साक्षरता और जागरूकता। नागरिकों को यह समझना होगा कि हर वायरल पोस्ट सच नहीं होती और हर वीडियो का संदर्भ सही नहीं होता। सवाल पूछना, जांचना और सोच-समझकर प्रतिक्रिया देना ही जिम्मेदार डिजिटल नागरिकता की पहचान है।
सोशल मीडिया एक दोधारी तलवार है। सही उपयोग में यह अपराध सुलझाने का शक्तिशाली हथियार है, लेकिन गलत उपयोग में यह अफवाहों और अराजकता का अड्डा बन सकता है। फैसला हमारे हाथ में है—हम इसे समाज की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करें या अव्यवस्था का कारण बनने दें।
जागरूक नागरिक, जिम्मेदार प्रशासन और सत्यापन आधारित साझा करना—यही सोशल मीडिया को वरदान बनाने का रास्ता है।






