16 C
Lucknow
Sunday, February 8, 2026

संबंधों में तनाव से दरकते रिश्ते

Must read

(डाॅ.पंकज भारद्वाज-विनायक फीचर्स)

पिछले कुछ वर्षों में समाज का एक स्पष्ट और चिंताजनक संकेत सामने आया है कि युवा वर्ग विवाह (youth marriage) जैसे पारंपरिक बंधन से दूरी बना रहा है और जहाँ विवाह हो भी रहा है, वहाँ संबंधों (Relationship) में जल्द ही तनाव, असंतोष और अंततः तलाक की स्थिति पैदा हो जा रही है। यह स्थिति केवल लड़कों तक सीमित नहीं है। लड़कियाँ भी समान रूप से विवाह और उससे जुड़ी जिम्मेदारियों को लेकर असमंजस में हैं। माता-पिता की इच्छा, अनुभव और समझ अब पहले जैसी निर्णायक नहीं रह गई है। इस बदलाव को केवल “पश्चिमी प्रभाव” या “नैतिक गिरावट” कहकर टाल देना ईमानदार विश्लेषण नहीं होगा। इसके पीछे गहरे सामाजिक, आर्थिक और मानसिक कारण हैं, जिन्हें समझना आवश्यक है।

आज का युवा पहले की तुलना में अधिक शिक्षित, आत्मनिर्भर और जागरूक है। वह अपनी पहचान, करियर और स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानता है। विवाह उसे कई बार एक ऐसे बंधन के रूप में दिखाई देता है, जिसमें समझौते अधिक हैं और व्यक्तिगत स्पेस कम। “मैं जैसा हूँ, वैसा स्वीकार किया जाऊँ”,यह अपेक्षा दोनों पक्षों में बढ़ी है, पर समायोजन की क्षमता घटती जा रही है। महँगाई, बेरोजगारी, अस्थिर नौकरी और करियर की अनिश्चितता भी विवाह से दूरी का बड़ा कारण है। पहले विवाह जीवन की सुरक्षा माना जाता था, आज कई युवाओं को लगता है कि पहले खुद स्थिर होना जरूरी है, रिश्ते बाद में।

विवाह के बाद बढ़ती आर्थिक जिम्मेदारियाँ तनाव को और गहरा कर देती हैं, जिससे संबंधों में कटुता जन्म लेती है। सोशल मीडिया ने रिश्तों की एक चमकदार, पर अवास्तविक तस्वीर पेश की है। ये स्थिति सामाजिक उत्थान में बाधक मानी जा रही है। भारतीय समाज में शादी एक समझौता नहीं बल्कि दो आत्माओं का मिलन माना जाता है। लेकिन जब आज की पीढ़ी शादी को बोझ समझना शुरू कर दे और दूसरे साथी की जिम्मेदारी से घबराने लगे तो इन कल्पनाओं से जब वास्तविक जीवन टकराता है, तो निराशा पैदा होती है। छोटी-छोटी बातों पर संवाद के बजाय टकराव होने लगता है।

शादी केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि निरंतर संवाद, समझ और धैर्य की मांग करती है। आज के रिश्तों में “सुनने” की जगह “कहने” की प्रवृत्ति अधिक है। असहमति को स्वीकार करने और साथ मिलकर समाधान खोजने की संस्कृति कमजोर पड़ रही है। परिणामस्वरूप तनाव बढ़ता है और तलाक को आसान विकल्प मान लिया जाता है।

माता-पिता का अनुभव आज भी मूल्यवान है, पर युवा उसे हस्तक्षेप के रूप में देखने लगे हैं। वहीं माता-पिता भी बदलते समय और मानसिकता को पूरी तरह समझ नहीं पा रहे। इस टकराव में विवाह जैसे फैसले और भी जटिल हो जाते हैं। इस स्थिति का समाधान न तो युवाओं को दोष देने में है और न ही परंपराओं को आँख मूँदकर थोपने में। जरूरत है ईमानदार संवाद, भावनात्मक शिक्षा और रिश्तों के प्रति यथार्थवादी दृष्टि की। विवाह को बोझ या मजबूरी नहीं, बल्कि साझेदारी और साझा जिम्मेदारी के रूप में समझना होगा।

समाज, परिवार और युवा तीनों को यह स्वीकार करना होगा कि समय बदला है, पर रिश्तों की बुनियादी जरूरतें, सम्मान, समझ, धैर्य और संवाद अब भी उतनी ही जरूरी हैं। इन्हीं मूल्यों को नए संदर्भ में अपनाकर ही विवाह संस्था को फिर से सार्थक और सफल बनाया जा सकता है।

(विनायक फीचर्स)

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article