मुंबई| राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संघ प्रमुख के चयन को लेकर जातिगत चर्चाओं पर स्पष्ट और बड़ा बयान दिया है। मुंबई में आयोजित आरएसएस के शताब्दी वर्ष कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि संघ का सरसंघचालक किसी जाति विशेष का नहीं होता। ब्राह्मण, क्षत्रिय या किसी अन्य जाति से होना इस पद के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि एकमात्र शर्त यह है कि वह व्यक्ति हिंदू हो।
डॉ. मोहन भागवत ने अपने संबोधन में साफ शब्दों में कहा कि आरएसएस में पदों का चयन जाति के आधार पर नहीं किया जाता। संघ का नेतृत्व विचार, संस्कार और समर्पण के आधार पर तय होता है। उन्होंने कहा कि संघ समाज को जोड़ने का कार्य करता है और इसलिए यहां जातिगत भेदभाव का कोई स्थान नहीं है। सरसंघचालक का पद पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करता है, न कि किसी एक वर्ग या जाति का।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब सार्वजनिक मंचों पर संघ और राजनीति में जाति की भूमिका को लेकर लगातार बहस होती रही है। भागवत के इस वक्तव्य को संघ की विचारधारा और सामाजिक समरसता के संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
कार्यक्रम के दौरान डॉ. भागवत ने भाषा के विषय पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि उन्हें अंग्रेजी भाषा से कोई विरोध नहीं है और जहां इसकी आवश्यकता होती है, वहां अंग्रेजी का उपयोग किया जाता है। हालांकि उनका व्यक्तिगत प्रयास हमेशा यही रहता है कि मातृभाषा या हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग किया जाए, ताकि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव बना रहे।
मुंबई में आयोजित आरएसएस के शताब्दी वर्ष कार्यक्रम में देश की कई जानी-मानी हस्तियां शामिल हुईं। इस अवसर पर संघ की वैचारिक यात्रा, सामाजिक भूमिका और भविष्य की दिशा पर भी चर्चा की गई। मोहन भागवत के इस बयान को संघ के भीतर और बाहर दोनों ही स्तरों पर अहम माना जा रहा है।





