यूथ इंडिया
तकनीक को आधुनिक सभ्यता का सबसे बड़ा वरदान कहा गया। इसने जीवन को सरल बनाया, दूरी को समाप्त किया और मानव क्षमता को नई उड़ान दी। लेकिन विडंबना यह है कि वही तकनीक, जो मानव कल्याण का माध्यम थी, आज धीरे-धीरे हमारे सामाजिक, मानसिक और नैतिक जीवन के लिए अभिशाप बनती जा रही है। सवाल यह नहीं है कि तकनीक बुरी है या अच्छी, सवाल यह है कि उसका उपयोग किस दिशा में और किस सीमा तक किया जा रहा है।
आज का मनुष्य स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से घिरा हुआ है। संवाद की सुविधा बढ़ी है, लेकिन संवाद की संवेदना घट गई है। परिवार के सदस्य एक ही छत के नीचे होते हुए भी अपनी-अपनी स्क्रीन में कैद हैं। बच्चों की दुनिया खेल के मैदान से निकलकर मोबाइल स्क्रीन तक सिमट गई है। तकनीक ने रिश्तों को जोड़ा जरूर, पर भावनात्मक दूरी भी उतनी ही तेजी से बढ़ाई।
मानसिक स्वास्थ्य पर तकनीक का प्रभाव सबसे चिंताजनक पहलू बन चुका है। सोशल मीडिया पर दिखती बनावटी खुशियां, तुलना की प्रवृत्ति और आभासी लोकप्रियता की दौड़ युवाओं को अवसाद, अकेलेपन और आत्महीनता की ओर धकेल रही है। ‘लाइक’ और ‘फॉलोअर्स’ आज आत्मसम्मान का पैमाना बनते जा रहे हैं। वास्तविक जीवन की असफलताएं, संघर्ष और साधारण सुख अब कम आकर्षक प्रतीत होने लगे हैं।
रोजगार और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भी तकनीक दोधारी तलवार साबित हो रही है। एक ओर ऑटोमेशन और एआई ने उत्पादन बढ़ाया है, वहीं दूसरी ओर परंपरागत नौकरियों पर संकट खड़ा कर दिया है। मशीनें तेज़ हैं, लेकिन वे मानवीय संवेदना, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का स्थान नहीं ले सकतीं। यदि तकनीक केवल मुनाफे का साधन बनकर रह जाएगी, तो सामाजिक असमानता और बेरोजगारी और गहरी होगी।
निजता का ह्रास भी तकनीक का एक गंभीर अभिशाप बन चुका है। हमारा डेटा, हमारी आदतें और हमारी पसंद अब कंपनियों और एल्गोरिद्म के नियंत्रण में हैं। हम स्वयं नहीं तय करते कि हम क्या देखें, क्या पढ़ें और क्या सोचें — यह काम अब तकनीक हमारे लिए करने लगी है। स्वतंत्रता के नाम पर हम धीरे-धीरे अदृश्य नियंत्रण के शिकार बनते जा रहे हैं।
तकनीक का दुरुपयोग अपराध और नैतिक पतन को भी बढ़ावा दे रहा है। साइबर अपराध, फर्जी खबरें, डीपफेक और ऑनलाइन ठगी समाज की नींव को कमजोर कर रही हैं। सत्य और असत्य के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। जब सूचना की बाढ़ में विवेक डूब जाए, तो लोकतंत्र और समाज दोनों संकट में पड़ जाते हैं।
समाधान तकनीक को नकारने में नहीं, बल्कि उसे विवेक और नैतिकता की लगाम देने में है। तकनीक मानव का साधन बने, स्वामी नहीं। शिक्षा प्रणाली में डिजिटल साक्षरता के साथ-साथ नैतिक साक्षरता भी अनिवार्य होनी चाहिए। परिवार, समाज और सरकार — तीनों को मिलकर यह तय करना होगा कि तकनीक मानवता के पक्ष में खड़ी रहे, न कि उसके विरुद्ध।
अंततः यह स्वीकार करना होगा कि तकनीक स्वयं न तो वरदान है और न ही अभिशाप। वह वही बनती है, जैसा हम उसे बनाते हैं। यदि हमने समय रहते संतुलन नहीं साधा, तो यह तथाकथित वरदान हमारे हाथों से फिसलकर ऐसा अभिशाप बन जाएगा, जिसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी।






