यूथ इंडिया
मनुष्य के जीवन में अधिकांश अशांति किसी बाहरी संकट से नहीं, बल्कि उसके भीतर पनपने वाले मोह से जन्म लेती है। मोह वह भाव है जो व्यक्ति को व्यक्ति, वस्तु और परिस्थितियों से इस हद तक जोड़ देता है कि वह उन्हें खोने की कल्पना मात्र से विचलित हो जाता है। यही मोह धीरे-धीरे चिंता, भय, क्रोध और असंतोष का कारण बनता है।
आज का मनुष्य भौतिक सुविधाओं से घिरा है, लेकिन मानसिक रूप से अस्थिर होता जा रहा है। इसका कारण यह है कि हमने संग्रह करना तो सीख लिया है, पर छोड़ना नहीं सीखा। हम यह भूल जाते हैं कि जीवन में जो कुछ भी मिला है, वह स्थायी नहीं है।
त्याग का अर्थ अक्सर गलत समझ लिया जाता है। त्याग का मतलब सब कुछ छोड़ देना या दुनिया से कट जाना नहीं है। त्याग का वास्तविक अर्थ है,अति-आसक्ति से मुक्त होना।रिश्ते निभाना त्याग के विरुद्ध नहीं है, लेकिन रिश्तों पर अधिकार जताना मोह है।धन अर्जित करना गलत नहीं है, लेकिन धन को ही सुरक्षा मान लेना मोह है।सम्मान पाना स्वाभाविक है, लेकिन उसे ही अपना मूल्य मान लेना मोह है।त्याग इन तीनों में संतुलन सिखाता है।
मोह व्यक्ति को भयभीत करता है। वह हर समय आशंकाओं में जीने लगता है, कहीं यह छूट न जाए, कहीं वह व्यक्ति दूर न हो जाए, कहीं मेरा स्थान कोई और न ले ले। यही डर व्यक्ति को समझौते करने, आत्मसम्मान छोड़ने और कभी-कभी गलत का साथ देने तक ले जाता है।
मोह में लिया गया निर्णय भावनात्मक होता है, जबकि त्याग में लिया गया विवेकपूर्ण होता है।
त्याग का अभ्यास कैसे किया जाए
त्याग कोई एक दिन का निर्णय नहीं, बल्कि दैनिक अभ्यास है।
हर बात पर तुरंत प्रतिक्रिया न देना
हर अपमान का जवाब देने की मजबूरी न रखना,हर इच्छा को तुरंत पूरा न करना,हर रिश्ते में खुद को पूरी तरह खो न देना,जब व्यक्ति यह स्वीकार कर लेता है कि हर चीज़ उसके नियंत्रण में नहीं है, वहीं से त्याग की शुरुआत होती है।
त्याग व्यक्ति को भीतर से हल्का करता है। जब मोह कम होता है, तो तुलना खत्म होती है, अपेक्षाएं कम होती हैं और शिकायतें स्वतः घटने लगती हैं। ऐसा व्यक्ति जीवन को बोझ नहीं, अनुभव की तरह जीने लगता है।
त्याग व्यक्ति को निष्क्रिय नहीं बनाता, बल्कि उसे स्पष्ट दृष्टि देता है। वह काम करता है, लेकिन परिणाम से बंधा नहीं रहता।
आज का समाज प्रतिस्पर्धा, प्रदर्शन और संग्रह पर आधारित है। हर व्यक्ति अधिक पाने की दौड़ में है। ऐसे समय में त्याग आत्मरक्षा का साधन बन जाता है। जो व्यक्ति छोड़ना जानता है, वही टूटने से बच पाता है।
त्याग कोई कमजोरी नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति का नाम है। जो व्यक्ति त्याग का अभ्यास कर लेता है, उसका मोह धीरे-धीरे ढीला पड़ जाता है। और जब मोह समाप्त होता है, तो भय, क्रोध और असंतोष भी स्वतः समाप्त होने लगते हैं।त्याग का अभ्यास करो
मोह अपने आप समाप्त हो जाएगा।

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