लखनऊ: केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार की दर्जनों योजनाएं (Government schemes) कागजों में सफल दिखाई जाती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत (ground reality) कुछ और ही कहानी बयां करती है। सरकारी फाइलों में लक्ष्य पूरे होने और करोड़ों लोगों को लाभ मिलने के दावे किए जाते हैं, जबकि गांव और शहरों में रहने वाले आम लोग आज भी योजनाओं के वास्तविक लाभ से वंचित नजर आ रहे हैं।
आवास योजना हो या रोजगार कार्यक्रम, स्वास्थ्य सुविधा हो या पेयजल योजना—अधिकांश योजनाओं में आंकड़े पूरे दिखाए जाते हैं, लेकिन लाभार्थी अधूरे रह जाते हैं। कई जगह आवास स्वीकृत तो हुए, लेकिन निर्माण अधूरा है। कहीं नाम सूची में है, लेकिन पैसा खाते में नहीं पहुंचा। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार देने के लिए चलाई जा रही योजनाएं स्थायी काम उपलब्ध कराने में नाकाम साबित हो रही हैं। मनरेगा जैसी योजनाओं में काम के दिन सीमित हैं और भुगतान में देरी आम बात बन गई है। स्वास्थ्य योजनाओं में अस्पतालों की कमी और दवाओं की अनुपलब्धता से मरीज परेशान हैं।
स्वच्छता और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं में भी विरोधाभास साफ दिखता है। कई गांवों को कागजों में खुले में शौच मुक्त घोषित कर दिया गया, लेकिन आज भी लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। नल तो लगाए गए, लेकिन कई जगह पानी नहीं आ रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि योजनाओं की असफलता का मुख्य कारण जवाबदेही की कमी है। योजनाओं की निगरानी मजबूत नहीं है और अधिकारी लक्ष्य पूरा दिखाने के दबाव में वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज कर देते हैं। ठेकेदारी व्यवस्था और भ्रष्टाचार भी बड़ी वजह मानी जा रही है।
आम जनता का कहना है कि योजनाओं का लाभ केवल चुनिंदा लोगों तक सीमित रह जाता है। पात्र लोग दफ्तरों के चक्कर लगाते रह जाते हैं, जबकि अपात्र लाभ उठा लेते हैं। शिकायत करने पर कार्रवाई के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिलते हैं। कुल मिलाकर, सरकारी योजनाएं कागजों में भले ही सफल दिखाई जाएं, लेकिन जब तक जमीन पर ईमानदार क्रियान्वयन, पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं होगी, तब तक योजनाएं आम जनता के जीवन में वास्तविक बदलाव नहीं ला पाएंगी।


