शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में लोधी समाज का इतिहास मजबूत और प्रभावशाली रहा है। एक समय था जब उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में लोधी समाज के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और मध्य प्रदेश में उमा भारती जैसे नेताओं ने न सिर्फ सत्ता संभाली, बल्कि अपने समाज को राजनीतिक पहचान भी दिलाई। लेकिन आज हालात इसके ठीक उलट हैं। वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार में लोधी समाज का एक भी डिप्टी मुख्यमंत्री नहीं है, और कैबिनेट में भी समाज को कोई प्रभावशाली या प्रमुख मंत्रालय नहीं मिला है।
यह स्थिति तब है जब राजनीतिक आकलनों के अनुसार उत्तर प्रदेश में लोधी समाज की आबादी करीब 6 से 8 प्रतिशत मानी जाती है। बुंदेलखंड, फर्रुखाबाद, एटा, कन्नौज, हरदोई, उन्नाव, बदायूं, लखीमपुर जैसे कई जिलों में लोधी समाज चुनावी रूप से निर्णायक भूमिका में रहता है। कई विधानसभा क्षेत्रों में लोधी वोट 10 से 15 प्रतिशत तक असर डालता है और जीत-हार तय करने की स्थिति में होता है।
2014 के लोकसभा चुनाव, 2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में लोधी समाज ने बड़े पैमाने पर भारतीय जनता पार्टी का समर्थन किया। इसके बावजूद सत्ता में भागीदारी न मिलना समाज के भीतर गहरी नाराजगी पैदा कर रहा है। आज लोधी समाज में यह भावना मजबूत होती जा रही है कि उन्हें केवल वोट बैंक के रूप में देखा जा रहा है, जबकि सत्ता और फैसलों में उनकी हिस्सेदारी लगातार घटती जा रही है।
पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह ‘राजू’ को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि वे मौजूदा राजनीतिक हालात से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। हालांकि उनके पुत्र वर्तमान में प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री हैं और यह उनका दूसरा कार्यकाल है, लेकिन समाज के लोगों का मानना है कि यह प्रतिनिधित्व नाममात्र का है, प्रभावशाली नहीं। नीतिगत फैसलों और सत्ता के केंद्र में लोधी समाज की आवाज कमजोर बनी हुई है।
इसी नाराजगी का राजनीतिक फायदा समाजवादी पार्टी उठाने की स्थिति में दिखाई दे रही है। सपा लगातार पिछड़े वर्गों की उपेक्षा, सम्मान और सत्ता में हिस्सेदारी जैसे मुद्दों को उठा रही है। लोधी समाज के भीतर यह चर्चा आम होती जा रही है कि यदि भाजपा ने समय रहते समाज को सम्मानजनक प्रतिनिधित्व नहीं दिया, तो आने वाले चुनावों में राजनीतिक रुख बदल सकता है।
आज लोधी समाज की स्थिति साफ है,वोट निर्णायक है, लेकिन सत्ता से दूरी बनी हुई है।
यदि यह स्थिति बनी रही, तो वह समाज जिसने सत्ता दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई, वही समाज भविष्य में सत्ता की दिशा बदलने की ताकत भी रखता है।

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