सुसीम
आज यूजीसी, आरक्षण, प्रमोशन में आरक्षण, जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी जैसे मुद्दों पर देशभर में जो लड़ाइयाँ चल रही हैं, दुर्भाग्य से उन्हें सामाजिक न्याय कहा जा रहा है।
सच यह है कि प्रत्येक वंचित व्यक्ति को सामाजिक न्याय की आवश्यकता है, लेकिन शोषक वर्ग ने सामाजिक न्याय की इस अवधारणा को इस तरह लागू किया है कि जनता को जनता से ही लड़ाया जा रहा है।
दरअसल, प्रत्येक वंचित जाति को सामाजिक न्याय देने का सिद्धांत सुनने में जितना आकर्षक है, व्यवहार में उतना ही भ्रामक साबित हुआ है। शासक वर्ग इस व्यवस्था के तहत जो भी अवसर देता है, उसका लाभ किसी जाति के आगे बढ़े हुए केवल दो प्रतिशत लोग ही उठा पाते हैं। शेष 98 प्रतिशत लोग सिर्फ आस लगाए बैठे रह जाते हैं।
यह कोई नई व्यवस्था नहीं है। शोषक वर्ग 1935 से ही—गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के माध्यम से—यही सामाजिक न्याय लागू करता आ रहा है। बीते लगभग 91 वर्षों में इसका लाभ कुल मिलाकर महज़ दो प्रतिशत लोगों को ही मिला है।
शुरुआती दौर में इस व्यवस्था से अपेक्षाकृत गरीब तबकों को कुछ लाभ मिला, लेकिन समय के साथ-साथ इसी से एक सीमित जातिगत मध्यवर्ग तैयार हो गया। दलितों और पिछड़ों के भीतर यह वर्ग आबादी का दो-तीन प्रतिशत से अधिक नहीं है।
आज स्थिति यह है कि यही दो प्रतिशत लोग इतने सक्षम हो चुके हैं कि वे अपनी ही जाति के गरीब युवाओं को प्रतियोगिता में टिकने नहीं देते। वे अपने हिस्से की नौकरियाँ ले रहे हैं—यहाँ तक तो उनकी कोई व्यक्तिगत गलती नहीं है।
गलती वहाँ शुरू होती है, जहाँ यह तथाकथित सामाजिक न्याय शोषक वर्ग के इशारे पर जातियों की आपसी लड़ाई में बदल जाता है। किसी एक जाति को दोषी ठहराकर जातिवाद फैलाया जाता है, जबकि असली दोष व्यवस्था का है।
सच यह है कि नौकरियाँ ही इतनी कम हैं कि यदि सभी जातियों में बराबरी से बाँटी जाएँ, तब भी गरीबों तक न्याय पहुँच ही नहीं पाएगा।
अंततः यह पूरा मामला केवल दो प्रतिशत अघाए हुए लोगों का बनकर रह जाता है। शोषक वर्ग इतनी चतुराई से इसे शेष 98 प्रतिशत का मुद्दा बना देता है कि एक जाति दूसरी जाति से लड़ने लगती है—और हम लड़ते हैं।
आज देश साम्प्रदायिक उन्माद की आग में झुलस रहा है। कुछ नेता इस आग को जातिवाद की आग से बुझाना चाहते हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि जातिवाद ने हमेशा साम्प्रदायिकता को ही मजबूत किया है।
1989 में दो सीटों वाली भाजपा को सत्ता तक पहुँचाने में जातिवादी राजनीति की बड़ी भूमिका रही। 1977 में भी जनसंघ पहली बार सत्ता में आया तो वह जातिवादी नेताओं के सहारे ही आया था। आज भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष गठबंधन, समर्थन और विरोध के नाम पर साम्प्रदायिक शक्तियों को मजबूत करने का काम जातिवादी दल ही कर रहे हैं।
सच्चाई यह है कि जातिवाद और साम्प्रदायिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। इनका आपसी संघर्ष अक्सर सिर्फ नूरा-कुश्ती होता है।
यदि साम्प्रदायिकता को परास्त करना है, तो पहले जातिवाद को परास्त करना होगा। जातिवादी राजनीति ने नौजवानों की सोच को विकृत कर दिया है।
पहले अपने भीतर के जातिवाद से लड़िए—फिर देखिए, ज्ञान कैसे बढ़ता है और शोषक वर्ग की साजिशों के परदे कैसे उठते हैं।
इस भ्रम से भी बाहर आइए कि कोई आरक्षण छीन लेगा। नौकरियाँ खत्म की जा सकती हैं, लेकिन आरक्षण नहीं। क्योंकि आरक्षण शोषक वर्ग का हथियार है—इसी के जरिए वह शोषित वर्गों में से उभरती प्रतिभाओं को अपने पाले में खींच लेता है।
जैसा कि मार्क्स ने कहा था—
“शोषक वर्ग की राजसत्ता उतनी ही मजबूत होती है, जितनी वह शोषित वर्ग की उभरती प्रतिभाओं को आत्मसात करने में सक्षम होती है।”
असली एकता की ज़रूरत
जातीय एकता नहीं, बल्कि मज़दूर एकता, किसान एकता और मेहनतकश वर्ग की एकता ही इसका सही जवाब है।
जातीय एकता—चाहे वह किसी पार्टी के रूप में ही क्यों न हो—अक्सर शोषक वर्ग के सामने झुकने, उनसे सौदेबाज़ी करने और जनता में फूट डालने का माध्यम बन जाती है।
आज देश महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, जमाखोरी, मिलावट, नशाखोरी और नैतिक पतन के गंभीर संकट से गुजर रहा है। इस लूट और शोषण को छिपाने के लिए जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और पहचान के नाम पर दंगे कराए जा रहे हैं।
अगर आज आप इसके खिलाफ नहीं उठे, तो आने वाली पीढ़ियाँ आपको माफ नहीं करेंगी।

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