▶ 4 लेन से 2 लेन—अचानक संकुचन बना हादसों और ट्रैफिक जाम का खतरा
▶ भविष्य के नाम पर वर्तमान से समझौता—MMRDA की योजना पर उठे गंभीर सवाल
▶ उद्घाटन से पहले ही विवादों में घिरा पुल—सुरक्षा ऑडिट जारी, सोशल मीडिया पर आक्रोश

यूथ इंडिया (सूर्या अग्निहोत्री)
मुंबई। मीरा-भायंदर में मेट्रो लाइन-9 के तहत बना नवनिर्मित डबल-डेकर फ्लाईओवर उद्घाटन से पहले ही विवादों में घिर गया है। जनवरी 2026 के अंत में वायरल हुए वीडियो में 4 लेन का पुल अचानक 2 लेन में सिमटता दिखा, जिसने करोड़ों रुपये की इस परियोजना को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया पर इसे “खतरनाक डिज़ाइन” और “ट्रैफिक जाम की फैक्ट्री” बताया जा रहा है।
करीब 100 करोड़ रुपये की लागत से बने इस फ्लाईओवर को मुंबई महानगर क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण (MMRDA) एक “नियोजित इंजीनियरिंग निर्णय” बता रहा है। दलील दी जा रही है कि अभी भायंदर पूर्व के लिए 2 लेन और भविष्य में भायंदर पश्चिम के लिए 2 लेन बनाई जाएंगी। मगर जनता पूछ रही है—जब पुल अधूरा है, तो उसे जल्दबाज़ी में चालू करने का दबाव क्यों?
इस डिजाइन को देखकर साफ नजर आता है कि प्राथमिकता जनता की सुविधा नहीं, बल्कि ठेका समय से निपटाने की है। संदेश मानो साफ हो—काम फटाफट पूरा करो, भुगतान लो और आराम करो, भाड़ में जाए जनता और देश। 4 लेन से 2 लेन में अचानक संकुचन को न तो सुरक्षित कहा जा सकता है, न ही जिम्मेदार योजना।
मीरा-भायंदर अकेला उदाहरण नहीं है। इससे पहले मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के ऐशबाग इलाके में बना रेलवे ओवरब्रिज भी ऐसे ही विकास के नाम पर जनता के साथ मजाक बन चुका है। करीब 18 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस RoB को उसकी लगभग 90-डिग्री की तीखी मोड़ वाली डिजाइन के कारण खतरनाक माना जा रहा है। ऐशबाग स्टेडियम के पास स्थित इस पुल ने भी इंजीनियरिंग समझ और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
यातायात विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रयोगधर्मी और अधकचरे डिज़ाइन हादसों और भारी जाम को न्योता देते हैं। MMRDA भले ही फरवरी 2026 में उद्घाटन और सुरक्षा ऑडिट की बात कर रहा हो, लेकिन मीरा-भायंदर का यह फ्लाईओवर अब एक पुल भर नहीं रहा। यह देशभर में फैलती उस ठेकेदारी मानसिकता का प्रतीक बन चुका है, जहां विकास का मतलब जनता की सुविधा नहीं, बल्कि फाइलें बंद करना और भुगतान निकालना रह गया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब फ़िल्म आदिपुरुष पर पैसा बर्बाद होने का आरोप लगाकर हंगामा खड़ा करने वाले लोग आज कहां हैं? जो लोग कला, आस्था और सिनेमा के नाम पर “पैसे की बर्बादी” का शोर मचाते थे, वे आज जनता की जान से जुड़े इन करोड़ों के प्रयोगों पर चुप क्यों हैं? क्या सवाल उठाने का साहस सिर्फ चुनिंदा मुद्दों तक सीमित है? मीरा-भायंदर का यह फ्लाईओवर अब सिर्फ एक निर्माण नहीं, बल्कि दोहरे मापदंड और मौन की राजनीति का प्रतीक बनता जा रहा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here