विरासत, संघर्ष और जनता के बीच खड़े होने की राजनीति
लखनऊ। बुंदेलखंड की सियासत में इन दिनों जिस नाम की सबसे ज्यादा चर्चा है, वह हैं ब्रजभूषण राजपूत। सोशल मीडिया पर उन्हें लोग मज़ाकिया अंदाज़ में “आश्रम के बॉबी देओल” कह रहे हैं, लेकिन राजनीति में उनकी पहचान सिर्फ चेहरे या शैली से नहीं, बल्कि जनता के बीच खड़े होने वाले नेता के रूप में बनती दिख रही है।
ब्रजभूषण राजपूत महोबा जनपद की चरखारी विधानसभा से लगातार दूसरी बार विधायक हैं। वे इलाके के जनप्रिय और मुखर नेताओं में गिने जाते हैं। राजनीति उन्हें विरासत में मिली है। उनके पिता गंगाचरण राजपूत बुंदेलखंड के चर्चित लोधी राजपूत नेताओं में रहे हैं, जिनकी पहचान जमीनी राजनीति और अपने समाज में गहरी पकड़ के लिए थी।
गंगाचरण राजपूत वही नेता थे जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन के दौर में कल्याण सिंह के एकछत्र लोधी नेता होने के राजनीतिक भ्रम को चुनौती दी थी। यही वजह रही कि भारतीय जनता पार्टी के भीतर गंगाचरण राजपूत को कभी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया। उन्होंने जनता दल और कांग्रेस के टिकट पर हमीरपुर लोकसभा से तीन बार चुनाव जीतकर संसद तक का सफर तय किया। वर्ष 2010 में वे राज्यसभा सदस्य भी बने और अपने समाज में एक मजबूत पहचान स्थापित की।
पिता की यही जमीनी राजनीति, जनता के बीच रहने की आदत और बेबाकी ब्रजभूषण राजपूत को विरासत में मिली। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा और लगातार दो बार चरखारी से विधायक चुने गए। क्षेत्र में उनकी व्यवहार कुशलता और लोगों से सीधे संवाद की चर्चा आम है।
लेकिन हाल ही में जब जन समस्याओं को लेकर उनका सब्र टूटा, तो सियासी मंच पर एक अलग ही तस्वीर देखने को मिली। सामने थे उत्तर प्रदेश सरकार के जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह। विधायक और मंत्री के बीच तीखी बहस हुई। ब्रजभूषण राजपूत ने अफसरशाही और विभागीय खामियों को खुले तौर पर गिनाया।
भारतीय जनता पार्टी जैसी अनुशासित पार्टी में इस तरह सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखना अक्सर अनुशासनहीनता की श्रेणी में गिना जाता है। लेकिन सवाल यह भी है कि जब बार-बार शिकायतों के बावजूद सुनवाई न हो, तो जनप्रतिनिधि के पास विकल्प क्या बचता है? ब्रजभूषण राजपूत ने इस सवाल का जवाब जनता को साथ लेकर दिया।
यह पहली बार देखा गया कि किसी विधायक ने अपनी ही सरकार के मंत्री के सामने सड़कों पर, जनता के बीच खड़े होकर अपनी बात इतनी बेबाकी से रखी। यही वजह है कि यह घटना केवल बुंदेलखंड तक सीमित नहीं रही, बल्कि मीडिया और सोशल मीडिया पर सुर्खियों का विषय बन गई।
आज ब्रजभूषण राजपूत को लेकर बहस सिर्फ उनके अंदाज़ या छवि की नहीं है, बल्कि उस राजनीति की है जिसमें जनता को आख़िरी विकल्प नहीं, बल्कि पहला हथियार बनाया गया। यही कारण है कि वे अचानक सियासी विमर्श के केंद्र में आ गए हैं—और शायद यही उनकी असली पहचान है।






