– चरखारी में सत्ता नहीं, आम संवेदना नें बना दिया जननेता
यूथ इंडिया
एक दौर था जब राजनीति में बाहुबली विधायक का मतलब माफिया, अपराध और दहशत से जोड़ा जाता था। बंदूक, डर और दबदबा—यही पहचान मानी जाती थी। लेकिन समय बदला है और जनता की परिभाषा भी। आज उत्तर प्रदेश के चरखारी से एक अलग तस्वीर सामने आई है, जहां बृजभूषण राजपूत ऐसे अकेले विधायक के रूप में उभरे हैं, जिन्हें जनता ने “जनता का बाहुबली” कहा है—क्योंकि उन्होंने हथियार नहीं, जनसमस्याओं को अपना औज़ार बनाया।
चरखारी में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ताकतवर मंत्री को रोककर सार्वजनिक विरोध दर्ज कराना, और फिर खुली चेतावनी देना कि 20 दिन में हालात नहीं सुधरे तो आवाज़ और बुलंद होगी—यह घटना बताती है कि असली ताकत पद में नहीं, जनादेश में होती है। यह प्रदर्शन सत्ता-लोलुपता नहीं, जवाबदेही की मांग थी।
हकीकत यह है कि उच्च पद पर बैठे किसी बड़े नेता को जिलों में पार्टीबंदी नहीं करानी चाहिए। चरखारी की विरोध-वारदात भी इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए। जिस कार्यक्रम में मंत्री जा रहे थे, वह स्थानीय विधायक के राजनीतिक विरोधी द्वारा आयोजित था। सवाल यह नहीं कि कौन गया, सवाल यह है कि स्थानीय जनप्रतिनिधि की भूमिका और जनभावना को नजरअंदाज क्यों किया गया?
राजनीति में समन्वय और मर्यादा जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी है स्थानीय सम्मान। जब यह टूटता है, तो विरोध स्वाभाविक है—और कभी-कभी आवश्यक भी।
यह कोई एक जनपद की कहानी नहीं। फर्रुखाबाद में एक ही परिवार को साधकर परंपरागत राजनीतिक संतुलन को तोड़ने का प्रयास हुआ। नतीजा—अंदर ही अंदर सुलगती असंतोष की आग, जिसकी चिंगारी कभी-कभी सोशल मीडिया पर दिख जाती है।
कन्नौज में भी ऐसा ही हुआ, जहां एक छूटभैये नेता को रातों-रात प्रदेश स्तर पर स्थापित कर दिया गया। लेकिन जनता के विरुद्ध काम, पिछड़ी जातियों के साथ दुर्व्यवहार और अहंकार ने उसे चंद वर्षों में ही फर्श पर ला दिया। राजनीति में शॉर्टकट अक्सर लंबी कीमत वसूलते हैं।
बैकडोर से शिखर तक पहुंचने पर सधी हुई चाल जरूरी है, ना की पुरानें अपनों को जिन्हे चमक आने के बाद मिले अवसरवादी कथित चांडालो से ही कटवाने की मुहिम की।
राजनीति के चरमोत्कर्ष पर यदि कोई व्यक्ति बैकडोर से भी पहुंचता है, तो उसे सधी हुई राजनीति करनी चाहिए—न कि अपने ही लोगों को काटने, नीचा दिखाने और हाशिए पर धकेलने की। इसका जीवंत उदाहरण देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह हैं, जो आज भी ध्रुव तारे की तरह चमक रहे हैं—क्योंकि उन्होंने धैर्य, संतुलन और संगठन को अपना मूलमंत्र बनाया।
चरखारी की घटना एक चेतावनी भी है और एक सीख भी।
बाहुबली वही, जो जनता के हक के लिए खड़ा हो।ताकत वही, जो संवेदना से आए।
राजनीति वही, जो मर्यादा से चले।
जनता अब डर नहीं, दृढ़ता चाहती है। और यही राजनीति का नया मापदंड है।

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