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Friday, January 30, 2026

थाना कादरी गेट की चौखट पर टूटता पीड़ितों का भरोसा- जब थानेदार ही सवालों के घेरे में आ जाए

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फर्रुखाबाद: कानून-व्यवस्था (Law and order) पर उठते सवाल अब सामान्य नहीं, गंभीर हो चुके हैं—और इन सवालों का केंद्र बन गया है थाना कादरी गेट (Qadri Gate police station)। बीते तीन दिनों में इसी थाना–चौकी क्षेत्र में तीन संगीन घटनाएं सामने आईं, लेकिन शुरुआती कार्रवाई में जो ढिलाई दिखी, उसने थाना अध्यक्ष की भूमिका पर सीधा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

27 जनवरी को रेटगंज में हिंसक झड़प—लाठी-डंडे चले, तमंचा लहराने का आरोप लगा, एक युवती गंभीर घायल हुई। पुलिस मौके पर पहुंची, दो लोग हिरासत में लिए गए—लेकिन एफआईआर तत्काल दर्ज नहीं हुई। “तहरीर नहीं मिली” का तर्क देकर मामला टाल दिया गया। सवाल यह है कि हथियार दिखाने और गंभीर चोट जैसे आरोपों में क्या संज्ञेय अपराध अपने आप दर्ज नहीं होते?

28 जनवरी को रोडवेज बस स्टैंड पर युवतियों से मारपीट—वही क्षेत्र, वही चौकी। संवेदनशील स्थल पर घटना के बावजूद निरोधक कार्रवाई और संदेशात्मक सख्ती नदारद दिखी।

इसके बाद दुष्कर्म का सनसनीखेज मामला—घटनास्थल थाना कादरी गेट क्षेत्र का, लेकिन पीड़िता को न्याय की पहली दस्तक दिल्ली में देनी पड़ी। विवेचना यहां पहुंची, तब जाकर मुकदमा दर्ज हुआ। यह देरी पीड़ित-हितैषी पुलिसिंग के दावे को कमजोर करती है।

तीनों घटनाओं की साझा कड़ी क्या है?
एक ही थाना–चौकी क्षेत्र,
शुरुआती स्तर पर सुस्ती,
और जवाबदेही का अभाव।

जब ऐसे मामलों में थाना अध्यक्ष त्वरित एफआईआर, साक्ष्य-संरक्षण, हथियार बरामदगी और आरोपियों पर सख्ती सुनिश्चित नहीं कर पाते, तो अपराधियों का मनोबल बढ़ता है और पीड़ितों का भरोसा टूटता है। सवाल किसी व्यक्ति पर नहीं, प्रणाली की जवाबदेही पर है—लेकिन जवाब तो थाना अध्यक्ष को ही देना होगा।

अब अपेक्षा है कि वरिष्ठ अधिकारी

एफआईआर में देरी की जिम्मेदारी तय करें,चौकी–थाना स्तर की निगरानी कसें,और संवेदनशील इलाकों में सक्रिय पेट्रोलिंग बहाल करें। क्योंकि अगर थाना कादरी गेट पर भरोसा नहीं रहा, तो कानून-व्यवस्था की पूरी इमारत डगमगाएगी। न्याय का पहला दरवाज़ा थाना होता है—अगर वही बंद मिले, तो सवाल सरकार से नहीं, थानेदार से होंगे।

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