प्रभात यादव
आज का युवा जितना ऑनलाइन है, उतना शायद इतिहास में कभी नहीं रहा। सुबह आंख खुलते ही मोबाइल स्क्रीन, दिन भर नोटिफिकेशन और रात को आख़िरी नज़र सोशल मीडिया पर—यह अब जीवनशैली बन चुकी है। सोशल मीडिया ने युवाओं को मंच दिया, पहचान दी और अपनी बात कहने की आज़ादी भी दी। लेकिन इसी आज़ादी के भीतर एक अदृश्य मानसिक जाल भी बुना जा रहा है, जिसका असर धीरे-धीरे सामने आ रहा है।
आज सफलता का पैमाना मेहनत, ईमानदारी या संतोष नहीं, बल्कि लाइक्स, व्यूज़ और फॉलोअर्स बनते जा रहे हैं। युवा अनजाने में ही अपने आत्ममूल्य को इन अंकों से जोड़ने लगा है। पोस्ट चली तो आत्मविश्वास बढ़ा, नहीं चली तो खुद पर शक। यह प्रक्रिया भीतर ही भीतर मानसिक थकान और असुरक्षा को जन्म देती है।
हर कोई सफल दिखना चाहता है
सोशल मीडिया पर हर चेहरा मुस्कुराता दिखता है—महंगी जगहें, बेहतर करियर, खुशहाल रिश्ते। लेकिन इस चमक के पीछे का संघर्ष अक्सर छिपा रहता है। युवा यह भूल जाता है कि सोशल मीडिया पर दिखने वाली ज़िंदगी एडिटेड और चुनी हुई सच्चाई होती है। नतीजा यह होता है कि वह अपनी वास्तविक ज़िंदगी को कमतर समझने लगता है।
30 सेकंड की रील और घटता धैर्य
रील और शॉर्ट वीडियो की दुनिया ने युवाओं की सोच पर गहरा असर डाला है। 30 सेकंड में मनोरंजन, ज्ञान और भावनाएं—सब कुछ परोस दिया जाता है। इसका परिणाम यह हुआ कि धैर्य, गहराई और लंबी सोच कमजोर होती जा रही है। किताबें, गंभीर बातचीत और ठहराव अब उबाऊ लगने लगे हैं।
फेक न्यूज़ और डिजिटल नफरत
सोशल मीडिया की सबसे खतरनाक सच्चाई फेक न्यूज़ और ट्रोलिंग है। अधूरी जानकारी, भ्रामक वीडियो और नफरत भरे पोस्ट युवाओं की सोच को प्रभावित कर रहे हैं। कई बार युवा बिना जांचे-परखे किसी विचारधारा या अफवाह का हिस्सा बन जाता है। ट्रोलिंग ने अभिव्यक्ति को डर में बदल दिया है—जो बोले, वही निशाने पर।
यह सच है कि सोशल मीडिया ने युवाओं को सवाल पूछने और मुद्दे उठाने की ताकत दी है। लेकिन जब वही प्लेटफॉर्म निरंतर तुलना, नफरत और दिखावे का माध्यम बन जाए, तो वह आवाज़ नहीं, कैद बन जाता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी धीरे-धीरे मानसिक दबाव में बदलने लगती है।
समाधान सोशल मीडिया से भागना नहीं, बल्कि समझदारी से उसका उपयोग करना है।
डिजिटल साक्षरता ज़रूरी है—क्या सच है, क्या झूठ, यह पहचानना
कंटेंट को देखकर नहीं, सोचकर स्वीकार करना,ऑनलाइन जीवन और वास्तविक जीवन के बीच संतुलन बनाना
और सबसे ज़रूरी—खुद की कीमत किसी एल्गोरिद्म से तय न होने देना।
सोशल मीडिया न पूरी तरह दुश्मन है, न पूरी तरह दोस्त। यह एक औज़ार है—जो सही हाथों में आवाज़ बनता है और गलत आदतों में मानसिक जाल। आज के युवा के सामने चुनौती यही है कि वह इस मंच का उपयोग करे, लेकिन खुद को इसमें खोने न दे।
क्योंकि जिस दिन स्क्रीन हमारी सोच तय करने लगे, उस दिन आज़ादी केवल भ्रम बनकर रह जाती है।






