उपकार मणि, उपकार
उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर सामाजिक न्याय के सवाल पर गर्म हो गई है। समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्याम लाल पाल के ताज़ा बयान ने सरकार, प्रशासन और व्यवस्था—तीनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। पिछड़ों और दलितों पर अन्याय, प्रोफेसरों की नियुक्ति में कथित धांधली और शंकराचार्य को स्नान से रोके जाने का मुद्दा—ये तीनों आरोप अलग-अलग दिखते हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से एक ही धागे से जुड़े हैं।
श्याम लाल पाल का आरोप सीधा है—प्रदेश में पिछड़े और दलित वर्ग के साथ व्यवस्थित अन्याय हो रहा है। यह बयान केवल भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि उस वर्गीय असंतोष का राजनीतिक स्वर है, जो लंबे समय से भर्ती, पदोन्नति और प्रतिनिधित्व के सवाल पर उबल रहा है। सपा इस मुद्दे को एक बार फिर केंद्र में लाकर यह संदेश देना चाहती है कि सामाजिक न्याय अब भी अधूरा एजेंडा है।
उच्च शिक्षा में प्रोफेसरों की नियुक्ति में धांधली का आरोप, सत्ता के ‘सुशासन’ के दावे पर सीधा प्रहार है। यदि नियुक्तियों में आरक्षण नियमों की अनदेखी होती है, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन बन जाती है। सपा इसे योग्यता बनाम पक्षपात की बहस में बदलकर शहरी–शैक्षणिक वर्ग तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश कर रही है।
शंकराचार्य को स्नान से रोके जाने का आरोप इस बयान को केवल सामाजिक नहीं, बल्कि धार्मिक–राजनीतिक आयाम देता है। सपा यहां दोहरी रणनीति अपनाती दिखती है—एक ओर वह सामाजिक न्याय की बात करती है, दूसरी ओर यह संदेश देती है कि मौजूदा व्यवस्था धार्मिक परंपराओं के प्रति भी असंवेदनशील है। यह कदम सीधे उस वोटर बेस तक पहुंचने की कोशिश है, जो धर्म और सम्मान को राजनीति से अलग नहीं देखता।
यह बयान ऐसे समय आया है, जब प्रदेश में सत्ता बनाम विपक्ष की लड़ाई नैरेटिव वॉर में बदल चुकी है। सत्तारूढ़ पक्ष विकास और कानून-व्यवस्था की बात करता है, जबकि विपक्ष सामाजिक न्याय, संवैधानिक मूल्यों और सम्मान के मुद्दे उठाकर नैतिक बढ़त लेने की कोशिश कर रहा है।
राजनीतिक निहितार्थ
श्याम लाल पाल का बयान संकेत देता है कि सपा आने वाले समय में
पिछड़ा–दलित मुद्दे को मुख्य चुनावी धुरी बनाएगी,
शिक्षा और नियुक्तियों को सुशासन की कसौटी पर परखेगी,
और धर्म से जुड़े मामलों में सरकार की संवेदनशीलता पर सवाल उठाएगी।
यह बयान केवल आरोपों का संग्रह नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का स्पष्ट संकेत है। सपा सत्ता को यह बताना चाहती है कि सामाजिक न्याय, शिक्षा की निष्पक्षता और धार्मिक सम्मान—तीनों मोर्चों पर जवाबदेही तय होगी। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार इन आरोपों का तथ्यात्मक जवाब देती है या यह मुद्दा जनआंदोलन का रूप लेता है।
समसामयिक राजनीति में यही असली लड़ाई है—विकास के दावे बनाम सामाजिक न्याय की हकीकत।






