भरत चतुर्वेदी
मनुष्य का मन जितना शक्तिशाली है, उतना ही भटकाने वाला भी। जब मन नफ़रत से भर जाता है, तो उसकी आँखों पर ऐसा परदा पड़ जाता है कि सच सामने होते हुए भी दिखाई नहीं देता। वहीं दूसरी ओर, अत्यधिक प्रेम कई बार हमें इतना अंधा कर देता है कि हम गलत को भी सही मानने लगते हैं। इन दोनों अवस्थाओं में मन विवेक खो देता है, और विवेक के बिना सत्य का साक्षात्कार असंभव है।
नफ़रत मन को संकुचित करती है। यह हमें विरोध में खड़ा करती है, दीवारें खड़ी करती है और हर घटना को पूर्वाग्रह की दृष्टि से देखने पर मजबूर कर देती है। नफ़रत में व्यक्ति सत्य को नहीं, बल्कि अपने आक्रोश को सही ठहराने के तर्क खोजता है। ऐसे में तथ्य महत्वहीन हो जाते हैं और भावनाएं निर्णय लेने लगती हैं।
वहीं अत्यधिक प्रेम भी कम खतरनाक नहीं होता। जब प्रेम विवेक से अलग हो जाता है, तो वह आसक्ति बन जाता है। आसक्ति में व्यक्ति सामने वाले की गलतियों को अनदेखा करता है, चेतावनियों को ठुकरा देता है और यथार्थ से मुंह मोड़ लेता है। प्रेम यदि संतुलन खो दे, तो वह भी सत्य को ढकने लगता है।
असली सच वही देख पाता है, जो राग और द्वेष—दोनों से ऊपर उठकर संतुलन में जीना सीख लेता है। संतुलन का अर्थ भावनाओं को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें समझना और नियंत्रित करना है। यह वह अवस्था है, जहां मन न तो किसी के पक्ष में अंधा होता है और न ही किसी के विरोध में आक्रामक। यहां विचार शांत होते हैं, दृष्टि स्पष्ट होती है और निर्णय निष्पक्ष।
यही संतुलन जीवन का वास्तविक दर्शन है। इसी अवस्था में मनुष्य स्वयं को भी ठीक से देख पाता है और संसार को भी। यहां सत्य किसी विचारधारा, भावना या व्यक्ति का बंधक नहीं रहता, बल्कि वह स्वतः प्रकट होता है। शांत मन में ही विवेक जन्म लेता है और विवेक से ही सही मार्ग का चयन संभव होता है।
आज के उथल-पुथल भरे समय में, जब समाज नफ़रत और अंधभक्ति के दो ध्रुवों में बंटता जा रहा है, संतुलन ही सबसे बड़ी साधना है। न राग में डूबना, न द्वेष में जलना—बल्कि दोनों के बीच स्थिर रहना। क्योंकि सच न तो चीखता है, न बहकाता है; वह केवल शांत मन में उतरता है।
यही जीवन की परिपक्वता है, यही वास्तविक दर्शन।




