माघ मेले में साधु-संतों के अपमान और कथित लाठीचार्ज ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सत्ता और सनातन के बीच संवाद टूट चुका है। यह कोई साधारण प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि उस वैचारिक संकट का विस्फोट है, जिसे वर्षों से दबाया जा रहा था। ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का बयान केवल आक्रोश नहीं, बल्कि हिंदुत्व की राजनीति पर सीधा अभियोग है।
जब एक शंकराचार्य यह कहता है कि “हम पर लाठियां चलवाई गईं”, तो यह आरोप नहीं, नैतिक पतन का प्रमाण बन जाता है। सनातन परंपरा में संत सत्ता के विरोधी नहीं होते—वे उसकी आत्मा होते हैं। लेकिन जब वही आत्मा कहे कि उसे कुचला गया, तो समझ लेना चाहिए कि कहीं न कहीं सत्ता ने दिशा खो दी है।
गौमाता आस्था या सिर्फ़ चुनावी प्रतीक?सबसे बड़ा और असहज सवाल गौमाता का है।
शंकराचार्य की मांग स्पष्ट है—
गौमाता को राज्य माता घोषित किया जाए, गोहत्या पर पूर्ण और प्रभावी प्रतिबंध लगे, केवल भाषण नहीं, कानूनी और संवैधानिक निर्णय हों
यही वह बिंदु है, जहां दो शीर्ष संत धाराएं आमने-सामने दिखती हैं।
एक ओर सनातन की वह परंपरा है, जो गाय को जीवन, धर्म और राष्ट्र की चेतना मानती है।
दूसरी ओर वह राजनीतिक हिंदुत्व है, जिसने गौमाता को पोस्टर, नारे और मंच तक सीमित कर दिया।
यह टकराव अब छिपा नहीं रहा।
“हिंदू होने की पहली शर्त गो-रक्षक होना है” — क्यों चुभा यह वाक्य?
शंकराचार्य का यह कथन सत्ता को इसलिए चुभा, क्योंकि यह दावे और धरातल के बीच की खाई उजागर करता है।
अगर गौ-रक्षा हिंदुत्व की आत्मा है, तो फिर—गोहत्या पर राष्ट्रव्यापी सख्त कानून क्यों नहीं?तस्करी आज भी क्यों जारी है?
संतों को आंदोलन की धमकी क्यों देनी पड़ रही है?
सच यह है कि हिंदुत्व का बड़ा हिस्सा अब सत्ता-सुख का पर्याय बन गया है, जबकि सनातन आज भी त्याग, तप और संघर्ष की मांग करता है।
“अब दिल्ली नहीं, लखनऊ से आवाज़ उठेगी”—यह वाक्य सिर्फ़ स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को वैचारिक चुनौती है।
योगी आदित्यनाथ एक संत-मुख्यमंत्री हैं। यही कारण है कि यह संघर्ष और भी तीखा हो गया है।अब सवाल यह नहीं कि सरकार क्या कहेगी,सवाल यह है कि संत सत्ता से क्या अपेक्षा करते हैं और सत्ता संतों को क्या समझती है?
अगर प्रशासन ने सच में संतों पर बल प्रयोग किया है, तो यह हिंदू समाज के भीतर पहली बार हुआ ऐसा टकराव है, जहां
राज्य की शक्ति और सनातन की साधना आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं।
यह स्थिति बेहद खतरनाक है।
यह अल्टीमेटम सिर्फ़ सरकार के लिए नहीं है।यह परीक्षा है—
हिंदुत्व की ईमानदारी की
सत्ता की नीयत की
और सनातन के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता की,
यदि 40 दिनों में ठोस निर्णय नहीं आए, तो आंदोलन होगा।
और तब यह आंदोलन किसी दल, किसी राज्य या किसी मुख्यमंत्री के खिलाफ नहीं रहेगा—
यह हिंदुत्व के खोखलेपन के खिलाफ होगा।अंतिम सवाल,क्या गौमाता सिर्फ़ नारा रहेंगी?
क्या संत सिर्फ़ मंच की शोभा बनकर रह जाएंगे?
क्या सनातन सत्ता का अनुचर बन जाएगा?या फिर…यह टकराव हिंदुत्व को आत्ममंथन के लिए मजबूर करेगा?अब चुप्पी भी एक पक्ष है।और समय तेज़ी से निकल रहा है।

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