डॉ आशीष यादव
जवानी कोई उम्र भर नहीं, एक संक्रमण है—बचपन की मासूमियत से निकलकर जिम्मेदारियों के कठोर यथार्थ में प्रवेश करने का। यही वह मोड़ है, जहां सोच बदलती है, सपने आकार लेते हैं और आंखें पहली बार पूरी तरह खुलती हैं। लेकिन अक्सर इन्हीं खुली आंखों के बीच ज़िंदगी ऐसे बिखरती है, जैसे सपनों की इमारत अचानक किसी अनदेखे झटके से धाराशाई हो गई हो।
जवानी में प्रवेश करते ही मन में सवालों की बाढ़ आ जाती है—मैं कौन हूं, मुझे क्या बनना है, और मेरी जगह इस दुनिया में कहां है? कल तक जो सपने रंगीन थे, आज उनसे हिसाब मांगा जाने लगता है। समाज, परिवार और व्यवस्था उम्मीदों का बोझ कंधों पर रख देती है, जबकि अनुभव अभी अधूरा होता है। यही असंतुलन भीतर एक चुप्पा संघर्ष पैदा करता है।
इस उम्र में सोच बदलती है। चीज़ें अब जैसी दिखाई देती हैं, वैसी नहीं लगतीं। आदर्श टूटते हैं, भरोसे दरकते हैं और रिश्ते भी नए अर्थ लेने लगते हैं। जवानी यह सिखाती है कि हर मुस्कान सच्ची नहीं होती और हर रास्ता मंज़िल तक नहीं जाता। सपनों की कीमत चुकानी पड़ती है—कभी समझौतों से, कभी असफलताओं से।
खुली आंखों से सपने देखने का साहस भी इसी दौर की देन है। लेकिन यही साहस कई बार पीड़ा बन जाता है, जब मेहनत के बावजूद परिणाम नहीं मिलते। पढ़ाई, नौकरी, प्यार, पहचान—हर मोर्चे पर मुकाबला है। और जब एक के बाद एक सपना टूटता है, तो ज़िंदगी भीतर ही भीतर धाराशाई होने लगती है।
फिर भी, जवानी केवल टूटने का नाम नहीं। यही वह समय है, जब टूटकर खुद को फिर से गढ़ा जाता है। असफलताएं अनुभव बनती हैं, भ्रम स्पष्टता में बदलते हैं और दर्द परिपक्वता सिखाता है। जो इस दौर में खुद से भागता नहीं, बल्कि सामना करता है, वही आगे चलकर जीवन को समझ पाता है।
जवानी में बदलती सोच दरअसल जीवन की पहली सच्ची पाठशाला है। यहां कोई पाठ्यक्रम तय नहीं, कोई परीक्षा घोषित नहीं—फिर भी हर दिन इम्तिहान है। सपने टूटते हैं, लेकिन उन्हीं टूटे टुकड़ों से यथार्थ की मजबूत नींव रखी जाती है।
शायद यही जवानी का सत्य है—
खुली आंखों से सपने देखना, और टूटने के बाद भी आगे बढ़ते रहना।






