शरद कटियार
30 जनवरी केवल एक तारीख नहीं, बल्कि भारत की आत्मा पर अंकित वह क्षण है, जब सत्य और अहिंसा के पुजारी बापू ने अपने प्राणों की आहुति देकर मानवता को एक ऐसा मार्ग सौंपा, जो आज भी दुनिया को दिशा देता है। महात्मा गांधी का बलिदान किसी एक व्यक्ति का अंत नहीं था, बल्कि एक विचार का शाश्वत आरंभ था।
बापू ने हथियारों की ताकत से नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा और नैतिक साहस से एक साम्राज्य को चुनौती दी। उन्होंने हमें सिखाया कि सबसे बड़ा युद्ध अपने भीतर के डर, घृणा और अन्याय के खिलाफ होता है। उनका जीवन स्वयं में एक प्रयोग था—सत्य के साथ, आत्मसंयम के साथ और समाज के अंतिम व्यक्ति के साथ खड़े रहने का प्रयोग।
गांधी का बलिदान इसलिए महान है क्योंकि उन्होंने सत्ता नहीं मांगी, सम्मान नहीं चाहा, बल्कि कर्तव्य को पूजा और सेवा को साधना बनाया। उनका सपना एक ऐसे भारत का था, जहां विकास का अर्थ केवल इमारतें नहीं, बल्कि इंसानियत की ऊंचाई हो; जहां स्वतंत्रता का मतलब केवल राजनीतिक आज़ादी नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और नैतिक जिम्मेदारी हो।
आज जब दुनिया हिंसा, असहिष्णुता और स्वार्थ के दौर से गुजर रही है, तब बापू का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। अहिंसा कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है—यह सत्य बापू ने अपने जीवन और मृत्यु दोनों से सिद्ध किया। उनका बलिदान हमें यह याद दिलाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल कानूनों से नहीं, चरित्र से होता है।
बापू को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब हम उनके आदर्शों को केवल भाषणों और समारोहों तक सीमित न रखें, बल्कि अपने आचरण में उतारें। जब सत्ता संवेदनशील हो, समाज सहिष्णु हो और नागरिक जिम्मेदार हों—तभी गांधी जीवित रहेंगे।
महात्मा गांधी शारीरिक रूप से भले ही हमारे बीच न हों, लेकिन उनका बलिदान आज भी हमें आईना दिखाता है—कि भारत की आत्मा सत्य और अहिंसा में ही सुरक्षित है।





