यूथ इंडिया
युवा और राष्ट्र की आत्मा
युवा किसी भी राष्ट्र की केवल आयु-आधारित श्रेणी नहीं होता, बल्कि वह राष्ट्र की चेतना, ऊर्जा और आत्मा होता है। युवा (Youth) वह वर्ग है जो अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाता है, परिवर्तन की चाह रखता है और जोखिम उठाने का साहस करता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब समाज जड़ता, भय या अन्याय में फंसा है, तब-तब युवाओं ने ही आगे बढ़कर बदलाव की मशाल थामी है।
हर क्रांति, हर सामाजिक आंदोलन और हर राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के केंद्र में युवा ही रहे हैं। चाहे स्वतंत्रता संग्राम हो, सामाजिक सुधार की लड़ाई हो या लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा—युवाओं ने कभी पीछे हटना नहीं सीखा। उन्होंने अपने स्वार्थ, सुविधा और यहां तक कि जीवन तक को राष्ट्र के लिए न्योछावर कर दिया।
आज देश ऐसे ही युवाओं की अपेक्षा कर रहा है, जो केवल अधिकारों की सूची न गिनाएं, बल्कि कर्तव्यों की जिम्मेदारी भी समझें। अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं। जब युवा केवल अधिकारों की मांग करता है और कर्तव्यों से मुंह मोड़ लेता है, तब समाज में असंतुलन पैदा होता है। लेकिन जब वही युवा अपने दायित्वों को समझकर आगे बढ़ता है, तब राष्ट्र सशक्त बनता है।
राष्ट्र निर्माण केवल सरकार, प्रशासन या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। यह सोच अधूरी और खतरनाक भी है। राष्ट्र निर्माण एक सामूहिक दायित्व है, जिसमें हर नागरिक की भूमिका होती है, और उस भूमिका का सबसे बड़ा भार युवाओं के कंधों पर होता है। युवा यदि उदासीन हो जाए, तो योजनाएं कागज़ों में सिमट जाती हैं। लेकिन यदि युवा सक्रिय हो जाए, तो असंभव भी संभव हो जाता है।
युवा वह शक्ति है जो समाज को प्रश्न करना सिखाती है, लेकिन साथ ही समाधान खोजने की क्षमता भी रखती है। सवाल उठाना आवश्यक है, पर उससे अधिक आवश्यक है जिम्मेदारी के साथ समाधान की ओर बढ़ना। आज का युवा यदि केवल आलोचक बनकर रह जाएगा, तो परिवर्तन अधूरा रह जाएगा। उसे सहभागी बनना होगा समाज, राजनीति, शिक्षा, स्वच्छता और सेवा हर क्षेत्र में।
युवा और राष्ट्र का संबंध केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि कर्तव्यपरक है। जब युवा अपने आसपास फैली कुरीतियों, भ्रष्टाचार, असमानता और अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है, तभी राष्ट्र की आत्मा जीवंत रहती है। यदि युवा चुप हो जाए, तो अन्याय को मौन स्वीकृति मिल जाती है।
आज आवश्यकता ऐसे युवाओं की है जो सत्य के पक्ष में खड़े हों, अनुशासन और ईमानदारी को अपनाएं,और राष्ट्रहित को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर रखें।
यही युवा राष्ट्र की आत्मा को मजबूत करेगा, लोकतंत्र को जीवंत रखेगा और देश को प्रगति के मार्ग पर आगे ले जाएगा।
निष्कर्षतः, जब तक युवा जागरूक, साहसी और कर्तव्यनिष्ठ रहेगा, तब तक राष्ट्र की आत्मा अक्षुण्ण रहेगी। क्योंकि राष्ट्र केवल भूगोल नहीं होता, राष्ट्र युवाओं की चेतना में बसता है।


