शरद कटियार की विस्तृत त्वरित टिप्पणी
Lucknow| यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन, 2026 पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई अंतरिम रोक को केवल एक तकनीकी कानूनी आदेश मानना भूल होगी। यह फैसला दरअसल नीति-निर्माण की दिशा, मंशा और संतुलन—तीनों पर एक गंभीर सवाल है। अदालत का यह स्पष्ट कहना कि अगले आदेश तक वर्ष 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे, यह बताता है कि नए नियमों को लागू करने से पहले पर्याप्त संवैधानिक और सामाजिक समीक्षा नहीं हुई।
मुख्य न्यायाधीश द्वारा की गई टिप्पणी—कि देश को जातिविहीन समाज की ओर बढ़ना चाहिए—इस पूरे विवाद की आत्मा है। यह सवाल अब केवल आरक्षण या समानता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह बन गया है कि क्या हम समानता के नाम पर समाज को और वर्गों में बांट रहे हैं? अगर नीति का परिणाम सामाजिक विभाजन को गहरा करता है, तो उस पर पुनर्विचार आवश्यक है।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें यह संकेत देती हैं कि यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन, 2026 समान अवसर के सिद्धांत से टकराता प्रतीत होता है। यदि किसी नियम से सामान्य वर्गों में असमानता की भावना जन्म लेती है, और वह यूजीसी एक्ट, 1956 तथा संविधान के मूल ढांचे से मेल नहीं खाता, तो उस पर रोक लगना न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका को दर्शाता है।
अदालत का यह कहना कि संरक्षण उन्हीं को मिलना चाहिए जिन्हें उसकी वास्तविक आवश्यकता है, एक संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण है। सामाजिक न्याय का उद्देश्य किसी वर्ग को स्थायी पहचान में कैद करना नहीं, बल्कि उन्हें उस स्तर तक सक्षम बनाना है जहां वे समान प्रतिस्पर्धा कर सकें। यही संवैधानिक भावना भी है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में समिति गठित करने के संकेत दिए हैं। यह दर्शाता है कि अदालत जल्दबाज़ी में किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहती, बल्कि व्यापक विमर्श और तथ्यों के आधार पर फैसला चाहती है। यह रवैया नीति-निर्माताओं के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में बिना व्यापक सहमति के निर्णय नहीं थोपे जा सकते।
फिलहाल, इस रोक के बाद देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में 2012 के नियमों के तहत ही व्यवस्था चलेगी। यह स्थिति सरकार और यूजीसी दोनों के लिए एक अवसर है।
अंततः, यह मामला सिर्फ यूजीसी रेगुलेशन का नहीं है। यह उस दिशा का सवाल है जिसमें देश की शिक्षा और सामाजिक नीति आगे बढ़ेगी—
विभाजन की ओर या संतुलित समानता की ओर।





