🖋️ शरद कटियार
यूजीसी बिल को लेकर देश में जो राजनीतिक बहस खड़ी की गई, वह अब किसी भ्रम में नहीं है। यह साफ हो चुका है कि यह बहस शिक्षा सुधार की नहीं, बल्कि सत्ता की सामाजिक संरचना और राजनीतिक नियंत्रण की है। यूजीसी बिल केवल एक कानून नहीं रहा, बल्कि वह आईना बन गया है जिसमें हर दल, हर नेता और हर सामाजिक समूह की असली राजनीति दिखाई देने लगी है।
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि अगर यूजीसी बिल वास्तव में ओबीसी और दलित समाज के खिलाफ होता, तो इस देश में सबसे पहले ओबीसी और दलित सड़कों पर होते। ऐसा नहीं हुआ। न व्यापक आंदोलन हुआ, न गांवों में उबाल दिखा, न सामाजिक संगठनों की कोई सुनामी उठी। इसके उलट, जो शोर दिखा वह सीमित था, चयनित था और वही चेहरे बार-बार सामने आए जो दशकों से सत्ता और व्यवस्था के केंद्र में रहे हैं।
यहीं से शक पैदा होता है कि विरोध का असली कारण बिल नहीं, बल्कि बदलती सत्ता है।
यूजीसी बिल के बहाने समान बनाम ओबीसी की जो बहस खड़ी की गई, वह न तो स्वतःस्फूर्त थी और न ही ज़मीनी। यह एक रणनीतिक बहस थी, जिसका उद्देश्य यह धारणा बनाना था कि मौजूदा सत्ता सामाजिक न्याय के खिलाफ है। लेकिन इस रणनीति की सबसे बड़ी विफलता यह रही कि उसी सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग खुद किस सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं, यह सवाल विरोध ने खुद खड़ा कर दिया।
आज देश के प्रधानमंत्री,”नरेंद्र मोदी”, हैं और गृहमंत्री,”अमित शाह”दोनों नेता ओबीसी पृष्ठभूमि से आते हैं। यह कोई नया तथ्य नहीं है, लेकिन राजनीति में कई बार तथ्य तब तक प्रभावी नहीं होते, जब तक उन्हें परिस्थितियाँ मजबूर न करें। यूजीसी बिल के विरोध ने वही मजबूरी पैदा कर दी।
जो लोग सत्ता को “सवर्ण सत्ता” कहकर हमला कर रहे थे, उन्हें अब यह जवाब देना मुश्किल हो गया कि अगर सत्ता सवर्णों के हाथ में है, तो देश के सबसे ताकतवर पदों पर बैठे लोग कौन हैं।
यह यहीं नहीं रुका। इस पूरी बहस में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव,”रामगोपाल यादव” ने खुद यूजीसी बिल के समर्थन में बयान दे दिया। यह कोई हल्का राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है। यह उस दल के भीतर से आया बयान है जो खुद को पीडीए राजनीति का सबसे बड़ा वाहक बताता रहा है।
जब किसी पार्टी का शीर्ष वैचारिक चेहरा सरकार के कानून के समर्थन में खड़ा हो जाए और पार्टी का बाकी हिस्सा विरोध में हो, तो जनता को यह समझाने की जरूरत नहीं पड़ती कि विरोध कितना खोखला है। यह स्थिति बताती है कि यूजीसी बिल का मुद्दा न तो वैचारिक रूप से स्पष्ट है और न ही विपक्ष के भीतर एकमत।
यहीं पर विपक्ष की राजनीति कमजोर पड़ती है।
समाजवादी पार्टी प्रमुख”अखिलेश यादव”लंबे समय से पीडीए का नारा देकर खुद को ओबीसी राजनीति का केंद्र मानते रहे हैं। लेकिन राजनीति केवल नारे से नहीं चलती। राजनीति यह देखती है कि संकट के समय कौन निर्णय लेता है, कौन स्पष्ट होता है और कौन भ्रम में दिखता है। यूजीसी बिल के मुद्दे पर समाजवादी राजनीति भ्रमित दिखाई दी।
एक तरफ़ विरोध, दूसरी तरफ़ उसी पार्टी के वरिष्ठ नेता का समर्थन — यह स्थिति जनता को यह सोचने पर मजबूर करती है कि असल में लड़ाई किस बात की है।
ओबीसी और दलित समाज की चुप्पी इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण संकेत है। यह चुप्पी डर की नहीं है। यह चुप्पी राजनीतिक परिपक्वता की है। यह समाज अब यह समझने लगा है कि कौन उसके नाम पर राजनीति कर रहा है और कौन सत्ता में बैठकर निर्णय ले रहा है। वह यह भी समझ रहा है कि विरोध की अगुवाई करने वाले चेहरे वही हैं जिन्हें सत्ता का केंद्र हाथ से फिसलता दिख रहा है।
राजनीति में एक कड़वा सच है—
जो सत्ता में होता है, वही असली सामाजिक प्रतिनिधित्व तय करता है।
बाकी सब बयानबाज़ी होती है।
यूजीसी बिल के विरोध ने यही साफ कर दिया है कि ओबीसी राजनीति अब केवल प्रतीक की राजनीति नहीं रही। वह सत्ता की राजनीति बन चुकी है। और सत्ता की राजनीति में सबसे ज्यादा तकलीफ उसी को होती है, जो दशकों तक निर्णय लेने का आदी रहा हो।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इसका असर साफ दिख रहा है। बयान तीखे हैं, आरोप सीधे हैं, लेकिन जनसमर्थन का वैसा उभार नहीं है जैसा होना चाहिए था। इसका कारण सीधा है—जनता को यह विरोध उसका अपना नहीं लग रहा।
यूजीसी बिल सही है या उसमें संशोधन की जरूरत है, यह बहस अपनी जगह है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इस बिल के विरोध ने सरकार को कमजोर नहीं किया, बल्कि उसे सामाजिक रूप से और मज़बूत किया है। खासकर उस ओबीसी समाज की नजर में, जो लंबे समय से सत्ता में वास्तविक भागीदारी चाहता रहा है।
राजनीति में धारणा सबसे बड़ा हथियार होती है। और यूजीसी बिल के विरोध ने यह धारणा बना दी है कि मौजूदा सत्ता केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी प्रतिनिधित्व करती है।
विरोध की राजनीति की सबसे बड़ी विफलता यही रही कि उसने सरकार को घेरने की कोशिश में खुद को उजागर कर दिया।
आज की राजनीति में जो यह नहीं समझ पा रहा कि समय बदल गया है, सत्ता का चरित्र बदल गया है और समाज अब पहले से ज्यादा समझदार हो गया है — वह पीछे छूट जाएगा।यूजीसी बिल ने यही सिखाया है।

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