प्रशांत कटियार

इस समय देश प्रदेश की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चित और बहस का केंद्र बना हुआ मुद्दा यूजीसी कानून है। विश्वविद्यालयों, शिक्षकों और छात्रों से जुड़ा यह विषय अचानक सियासी एजेंडे के शीर्ष पर आ गया है। लेकिन अगर इसे केवल शिक्षा सुधार के चश्मे से देखा जाए, तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी। दरअसल, यूजीसी कानून का उभार 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बदले राजनीतिक हालात से गहराई से जुड़ा हुआ है।
2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में बेहद मजबूत स्थिति में थी। 62 सीटों की जीत ने यह संदेश दे दिया था कि भाजपा का सामाजिक और राजनीतिक आधार लगभग अडिग है। 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू होने का उसका कोई तत्काल राजनीतिक असर नहीं दिखा। पिछड़े और दलित वर्ग में असंतोष था, पर वह खुलकर सामने नहीं आया।
इसका वास्तविक असर 2024 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला। समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक) फार्मूले ने चुप बैठे वर्गों को एक राजनीतिक भाषा दी। नतीजतन, समाजवादी पार्टी 5 सीटों से बढ़कर 37 सीटों तक पहुंच गई, कांग्रेस भी 1 से 6 सीटों पर आ गई, जबकि भाजपा को उत्तर प्रदेश में बड़ा नुकसान उठाना पड़ा और वह 33 सीटों के साथ नंबर दो की पार्टी बन गई। यही नहीं, केंद्र में भी भाजपा पूर्ण बहुमत से सरकार नहीं बना सकी। यह बदलाव सत्ता के लिए साफ चेतावनी था।इसी पृष्ठभूमि में यूजीसी कानून को लेकर बहस तेज होती है। यह मुद्दा आते ही राजनीतिक विमर्श की दिशा बदलने लगी। पिछड़े, दलित और वंचित वर्गों के वे सवाल, जो 2024 में वोट के रूप में उभरे थे जैसे सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और रोजगार धीरे धीरे हाशिये पर जाने लगे। कांग्रेस जिस मनरेगा जैसे जमीनी मुद्दे को लेकर सरकार को घेर रही थी, वह भी यूजीसी के शोर में दब गया।
यही वह बिंदु है जहां भाजपा की रणनीति पर सवाल उठते हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा की सामाजिक संरचना देखें तो आज भी सवर्ण विधायकों का दबदबा स्पष्ट है ब्राह्मण 52 और ठाकुर 49 विधायकों की संख्या सबसे अधिक है। इसके बावजूद विमर्श इस तरह गढ़ा जा रहा है कि असली सत्ता संतुलन पर चर्चा कम हो और बहस नए, तकनीकी और भावनात्मक मुद्दों में उलझी रहे।
यूजीसी कानून पर दो चार प्रतिशत मुखर विरोध जरूर दिख रहा है, लेकिन बड़ा वर्ग या तो भ्रम में है या फिर मूल सवालों को भूलता जा रहा है। यह स्थिति बताती है कि मुद्दा सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि एजेंडा तय करने की राजनीति का है।उत्तर प्रदेश से ही केंद्र की सत्ता का रास्ता निकलता है। ऐसे में आने वाला समय यह तय करेगा कि पिछड़े और दलित समाज 2024 में दिखी अपनी राजनीतिक ताकत को समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के जरिए आगे बढ़ा पाते हैं या फिर यूजीसी जैसे मुद्दों के सहारे विमर्श को फिर से मोड़ दिया जाएगा। 2024 ने संकेत दिया है कि सत्ता अजेय नहीं है, अब देखना यह है कि यह चेतना टिकाऊ बनती है या नहीं।

लेखक दैनिक यूथ इंडिया के स्टेट हेड है।

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