भारतीय समाचार पत्र दिवस |


आज भारतीय समाचार पत्र दिवस है। लेकिन यह दिन अब केवल शुभकामनाओं और सोशल मीडिया पोस्टों तक सीमित होता जा रहा है। ज़मीनी सच्चाई यह है कि पत्रकारिता आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है, और इस दौर का सबसे बड़ा बोझ युवा पत्रकार उठा रहा है।
पत्रकारिता आज किस हाल में है
आज पत्रकारिता दो हिस्सों में बँटी दिखती है —एक तरफ़ सत्ता के करीब बैठी चमकदार पत्रकारिता,
दूसरी तरफ़ गांव-कस्बों में संघर्ष करती असली पत्रकारिता।
युवा पत्रकार ज़्यादातर दूसरे हिस्से में हैं —जहाँ न सुरक्षा है,न तय वेतन,न सम्मान,और न ही संस्थान का सहारा।सच यह है।आज सच लिखना जोखिम बन चुका है।सच लिखो तो एफआईआर
नाम लो तो धमकी
सवाल पूछो तो नौकरी खतरे में
जमीन पर जाओ तो दबंग सामने
यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि आज की सामान्य स्थिति है।
युवा पत्रकार सबसे आसान रास्ता क्यों चुन रहा है
कई युवा पत्रकार आज यह सोचने लगे हैं कि“चुप रहो, सुरक्षित रहो”
“प्रेस नोट छाप दो, खबर बन जाएगी”यहीं से पत्रकारिता मरती है।
जो पत्रकार केवल प्रेस नोट, सरकारी बयान और फोटो से खबर बनाता है,वह पत्रकार नहीं, सूचना विभाग का विस्तार है।
खबर और सत्ता में फर्क समझो
युवा पत्रकारों को साफ समझ लेना चाहिए —सत्ता का काम छवि बनाना है,
पत्रकार का काम सच दिखाना है।
अगर आप,सिर्फ़ उद्घाटन,सिर्फ़ माला,सिर्फ़ भाषण,ही लिख रहे हैं,तो आप जनता के साथ नहीं, सत्ता के साथ खड़े हैं।
आज पत्रकारिता में सबसे खतरनाक चीज़ गोली या जेल नहीं है,सबसे खतरनाक चीज़ है — बिकाऊ कलम।
जब कलम झुकती है, तो सिर्फ़ खबर नहीं मरती, लोकतंत्र कमजोर होता है।
युवा पत्रकारों से सीधा सवाल
क्या आप सच लिखने आए हैं? या सिर्फ़ पास बनाने? या किसी नेता का मीडिया मैनेजर बनने? अगर सच लिखने की हिम्मत नहीं है,तो इस पेशे में बने रहना खुद से और समाज से धोखा है। सोशल मीडिया हथियार भी, खतरा भी, आज हर युवा पत्रकार के हाथ में मोबाइल है। यह ताकत है, लेकिन जिम्मेदारी भी।बिना जांच, बिना सबूत, बिना संतुलन,लिखी गई खबर,सच को नहीं, पत्रकार को नुकसान पहुँचाती है।जल्दी वायरल होना पत्रकारिता नहीं,सही लिखना पत्रकारिता है।
युवा पत्रकार को क्या करना चाहिए
सीधी और साफ बात —जमीन पर जाओ,पीड़ित से बात करो,दस्तावेज़ देखो,दोनों पक्ष लिखो,दबाव में मत झुको गलती हो सकती है,लेकिन जानबूझकर झूठ नहीं।
यह दिन मिठाई बाँटने का नहीं है।
यह दिन खुद से पूछने का है  “क्या मैं सच के साथ खड़ा हूँ या सुविधा के साथ?”अगर जवाब सुविधा है,तो यह पेशा छोड़ देना ज़्यादा ईमानदारी है। युवा पत्रकारों, यह दौर आपकी परीक्षा ले रहा है।
या तो आप डर के आगे झुकेंगे या सच के लिए खड़े होंगे बीच का रास्ता नहीं है। याद रखो पत्रकारिता सत्ता की सेवा नहीं,जनता की जिम्मेदारी है। कलम उठाओ,लेकिन बिकने के लिए नहीं —लड़ने के लिए।

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