शरद कटियार
करीब बारह दिन तक प्रयागराज (Prayagraj) की सियासत और साधु-संतों की आवाज़ का केंद्र बने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद (Shankaracharya Avimukteshwarananda) ने बुधवार को अपना धरना समाप्त कर आश्रम के लिए प्रस्थान किया। धरना भले खत्म हो गया हो, लेकिन उससे उठी लहरें थमी नहीं हैं। उलटे, उसी दिन अमित शाह के गांधीनगर से आए बयान—“जो सरकार सनातन का सम्मान नहीं करती…”—ने बहस को नई धार दे दी। नतीजा यह कि उत्तर प्रदेश सरकार से शंकराचार्य के टकराव की चर्चाएं एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गईं।
प्रयागराज में चले इस धरने का स्वर केवल किसी एक मांग तक सीमित नहीं था। यह आस्था, परंपरा और शासन के बीच बढ़ती दूरी की शिकायत भी था। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का तर्क स्पष्ट रहा—सनातन परंपराओं और धार्मिक भावनाओं से जुड़े मुद्दों पर सरकारों को संवेदनशीलता और संवाद दिखाना चाहिए, न कि प्रशासनिक कठोरता।
धरने के दिनों में राज्य सरकार से उनका टकराव वैश्विक मीडिया तक पहुंचा। समर्थकों ने इसे “धर्म की आवाज़” कहा, तो विरोधियों ने “राजनीतिक दबाव” करार दिया। लेकिन एक तथ्य निर्विवाद रहा—धरने ने सरकार को असहज किया और सत्ता–संत समीकरण को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया। धरना खत्म करना किसी समझौते का संकेत था या रणनीतिक विराम—यह प्रश्न स्वाभाविक है। शंकराचार्य का आश्रम लौटना यह बताता है कि वे टकराव को स्थायी संघर्ष में बदलने के पक्षधर नहीं, बल्कि संवाद की गुंजाइश बनाए रखना चाहते हैं। परंतु यह भी उतना ही सच है कि धरना समाप्त होते ही मुद्दा समाप्त नहीं हुआ। बल्कि, राजनीतिक संकेतों ने इसे और व्यापक बना दिया।
उसी दिन गांधीनगर से अमित शाह का बयान आया—“जो सरकार सनातन का सम्मान नहीं करती…”। यह पंक्ति मात्र एक वाक्य नहीं थी; यह राजनीतिक संकेत भी थी। बयान ने दो स्तरों पर असर डाला— आंतरिक राजनीति: क्या यह संदेश उन सरकारों के लिए था जो धार्मिक भावनाओं के प्रश्नों पर कठोर या उदासीन दिख रही हैं? राष्ट्रीय विमर्श: क्या सनातन और शासन के रिश्ते को फिर से परिभाषित करने की कोशिश है?
यहीं से यूपी सरकार के साथ शंकराचार्य के टकराव की बातें फिर “बाजार” में आ गईं। समर्थकों ने इसे नैतिक समर्थन माना, जबकि आलोचकों ने कहा—धर्म को सत्ता–संकेतों से जोड़ना खतरनाक मिसाल है। उत्तर प्रदेश सरकार के सामने यह स्थिति दोहरी चुनौती बनकर उभरी है। एक ओर कानून–व्यवस्था और प्रशासनिक अनुशासन, दूसरी ओर धार्मिक परंपराओं का सम्मान। शंकराचार्य जैसे प्रभावशाली धर्माचार्य के साथ खुला टकराव सरकार के लिए राजनीतिक जोखिम है; वहीं पीछे हटना प्रशासनिक कमजोरी के रूप में भी देखा जा सकता है।
यही कारण है कि सरकार की भाषा में संतुलन दिखा—न खुली मुठभेड़, न पूरी रियायत। भारत में संत और सत्ता का रिश्ता नया नहीं। इतिहास बताता है कि जब-जब सत्ता ने आस्था को अनसुना किया, तब-तब सामाजिक उथल-पुथल बढ़ी। शंकराचार्य का धरना उसी परंपरा का आधुनिक अध्याय है—जहां धर्म सार्वजनिक विमर्श बन जाता है और सत्ता को जवाब देना पड़ता है।
निष्कर्षतः विराम नहीं, विमर्श
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का धरना खत्म होना अंत नहीं, बल्कि विराम है। अमित शाह के बयान ने यह साफ कर दिया कि सनातन और शासन का प्रश्न आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस के केंद्र में रहेगा।सवाल यही है—क्या सरकारें आस्था के साथ संवाद का रास्ता चुनेंगी, या टकराव की राजनीति जारी रहेगी?प्रयागराज से गांधीनगर तक फैली यह बहस बताती है कि सनातन केवल धार्मिक विषय नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का स्थायी हिस्सा बन चुका है।


