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Wednesday, January 28, 2026

क़ानून का सख्त संदेश: ‘गलत सूचना देने वाला भी अपराधी’

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प्रशांत कटियार
झूठी और दुर्भावनापूर्ण एफआईआर के बढ़ते मामलों पर सख्त रुख अपनाते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला आदेश दिया है, जो इन दिनों क़ानून के प्रति लोगों में विश्वास और मजबूत कर रहा है,अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि किसी एफआईआर की जांच में यह सामने आता है कि वह झूठी, मनगढ़ंत या किसी को फँसाने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई है, तो पुलिस को उस सूचनाकर्ता के खिलाफ अनिवार्य रूप से आपराधिक मुकदमा दर्ज करना होगा।
यह महत्वपूर्ण आदेश उम्मे फरवा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले की सुनवाई के दौरान पारित किया गया, जिसे न्यायिक हलकों में झूठी एफआईआर के खिलाफ मील का पत्थर माना जा रहा है।
क्या कहा हाई कोर्ट ने हाई कोर्ट ने कहा कि झूठी एफआईआर केवल निर्दोष व्यक्ति की स्वतंत्रता को ही नहीं छीनती, बल्कि पुलिस का समय और संसाधन बर्बाद करती है,न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ डालती है,और समाज में भय व अविश्वास का माहौल पैदा करती है।अदालत ने साफ किया कि यदि जांच अधिकारी यह जानते हुए भी कि FIR झूठी है, सूचनाकर्ता के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता, तो इसे न्यायालय की अवमानना माना जाएगा और संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है।
हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार—
केवल क्लोजर रिपोर्ट लगाकर मामला खत्म करना अब पर्याप्त नहीं होगा।
झूठी FIR साबित होने पर IPC की संबंधित धाराओं में सूचनाकर्ता पर मुकदमा दर्ज करना अनिवार्य है।
झूठे बयान देने वाले गवाहों पर भी कार्रवाई की जा सकती है।
यह आदेश पुलिस की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव लाने वाला माना जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में व्यक्तिगत रंजिश, संपत्ति विवाद, वैवाहिक झगड़े और राजनीतिक दुश्मनी के चलते झूठी एफआईआर दर्ज कराने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं।
अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में
निर्दोष लोग सालों तक मुकदमों में फँसे रहते हैं,उनकी सामाजिक छवि और करियर बर्बाद हो जाता है,और अंत में दोषी बच निकलते हैं।
हाई कोर्ट का यह आदेश ऐसे मामलों पर ब्रेक लगाने की कोशिश है।
इस फैसले के बाद—कोई भी व्यक्ति अब झूठी शिकायत दर्ज कराने से पहले सौ बार सोचेगा,निर्दोष लोगों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी,और पुलिस पर भी जवाबदेही का दबाव बढ़ेगा।
कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश “एफआईआर को हथियार” बनाने की प्रवृत्ति पर करारा प्रहार है। यदि इसका ईमानदारी से पालन हुआ, तो “झूठी एफआईआर की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आ सकती है।”
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह आदेश साफ संदेश देता है कि कानून का दुरुपयोग अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।अब सिर्फ आरोपी ही नहीं, बल्कि झूठी FIR दर्ज कराने वाला भी कटघरे में खड़ा होगा। यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में संतुलन, न्याय और जवाबदेही की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
लेखक, यूथ इंडिया न्यूज़ ग्रुप के स्टेट हेड और क़ानून के जानकर हैँ।

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