भारत के साथ ट्रेड डील से इन दिनों ई यू यानि यूरोपीय संघ चर्चा में है। यूरोपीय संघ केवल देशों का समूह नहीं है, वह इतिहास की प्रयोगशाला है जहाँ सदियों की लड़ाइयों, साम्राज्यों के उत्थान पतन और सीमाओं के खून से खिंचे नक्शों के बाद यह तय किया गया कि अब तलवार नहीं, समझौता चलेगा। द्वितीय विश्व युद्ध के मलबे से उठकर यूरोप ने यह स्वीकार किया कि राष्ट्रवाद की अति अंततः राष्ट्रों को ही लहूलुहान करती है। इसी स्वीकारोक्ति से जन्म हुआ यूरोपीय संघ का, जो आज दुनिया की सबसे संगठित और जटिल बहुराष्ट्रीय संरचनाओं में से एक है।
वर्तमान यूरोपीय संघ में सत्ताईस देश शामिल हैं। जर्मनी और फ्रांस इसकी धुरी माने जाते हैं, तो इटली और स्पेन इसकी ऐतिहासिक आत्मा हैं। नीदरलैंड, बेल्जियम और लक्जमबर्ग जैसे छोटे देश इसके प्रशासनिक संतुलन को साधते हैं। पूर्वी यूरोप से पोलैंड, हंगरी, चेक गणराज्य, स्लोवाकिया, रोमानिया और बुल्गारिया जैसे देश इसके विस्तार का प्रतीक हैं। बाल्टिक क्षेत्र के एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया इसकी रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत करते हैं। साइप्रस और माल्टा भूमध्य सागर की आवाज हैं, जबकि स्कैंडिनेवियाई स्वीडन, फिनलैंड और डेनमार्क इसकी सामाजिक चेतना को आकार देते हैं। ब्रिटेन कभी इसका हिस्सा था, पर ब्रेक्जिट ने यह सिखा दिया कि संघ में रहना भी एक राजनीतिक धैर्य की मांग करता है।
यूरोपीय संघ की कोई एक राजधानी नहीं है, और यही उसकी खासियत भी है। यह सत्ता को एक स्थान पर केंद्रित करने के बजाय उसे फैलाकर संतुलित करता है। ब्रसेल्स इसका प्रशासनिक चेहरा है, जहाँ से नीतियां बनती हैं और फाइलें चलती हैं। स्ट्रासबर्ग लोकतांत्रिक मंच है, जहाँ यूरोपीय संसद की बहसें गूंजती हैं। लक्जमबर्ग न्यायिक विवेक का केंद्र है, जहाँ कानूनों की आत्मा को परखा जाता है। यह बिखराव दरअसल शक्ति के विकेंद्रीकरण का प्रतीक है, जो यूरोपीय संघ की मूल भावना से मेल खाता है।
मुद्रा के स्तर पर यूरोपीय संघ ने साहसिक कदम उठाया। यूरो नामक साझा मुद्रा को अपनाकर कई देशों ने अपनी सदियों पुरानी राष्ट्रीय मुद्राओं को इतिहास में दर्ज कर दिया। यह केवल नोट और सिक्के बदलने का मामला नहीं था, यह आर्थिक संप्रभुता का साझा प्रयोग था। हालांकि सभी सदस्य देशों ने यूरो को नहीं अपनाया है। कुछ देशों ने अपनी मुद्रा बनाए रखी है, ताकि आर्थिक नीतियों पर उनका सीधा नियंत्रण बना रहे। यूरोपीय केंद्रीय बैंक फ्रैंकफर्ट से इस साझा मुद्रा की नब्ज थामे बैठा है, और पूरे महाद्वीप की आर्थिक धड़कन को संतुलित रखने की कोशिश करता है।
लोकतंत्र की दृष्टि से यूरोपीय संघ एक दिलचस्प संरचना है। यहां नागरिक केवल अपने देश की सरकार नहीं चुनते, बल्कि एक महाद्वीपीय संसद के प्रतिनिधि भी चुनते हैं। हर पांच वर्ष में होने वाले यूरोपीय संसद के चुनाव इस बात का संकेत हैं कि नागरिकों की आवाज राष्ट्रीय सीमाओं से आगे जाकर सुनी जाती है। हालांकि अक्सर यह भी देखा गया है कि आम नागरिक यूरोपीय चुनावों को राष्ट्रीय राजनीति की कसौटी पर ही तौलता है, जिससे संघ और जनता के बीच दूरी की बहस जन्म लेती है।
प्रशासनिक ढांचे में यूरोपीय संघ एक संतुलन साधने की निरंतर कोशिश है। यूरोपीय आयोग प्रस्ताव लाता है, यूरोपीय परिषद दिशा तय करती है, संसद बहस और संशोधन करती है, और न्यायालय अंतिम व्याख्या करता है। यह प्रक्रिया धीमी लग सकती है, पर यही इसकी मजबूती भी है। जल्दबाजी में लिए गए फैसलों से यूरोप पहले ही बहुत कुछ खो चुका है, इसलिए यहां निर्णय समय लेते हैं, पर सोच समझकर लिए जाते हैं।
अंततः यूरोपीय संघ एक राजनीतिक व्यवस्था से अधिक एक विचार है। यह विचार कि विविध भाषाएं, संस्कृतियां और राष्ट्रीय स्वार्थ एक साझा मंच पर रह सकते हैं। यह प्रयोग पूरी तरह सफल है या नहीं, यह बहस का विषय हो सकता है, पर इतना तय है कि यूरोपीय संघ ने दुनिया को यह दिखाया है कि शक्ति केवल सैन्य या आर्थिक नहीं होती, बल्कि सहयोग और सहमति भी एक बड़ी ताकत हो सकती है। शायद इसी कारण यूरोपीय संघ आज भी विश्व राजनीति में एक शांत लेकिन प्रभावशाली उपस्थिति बना हुआ है। (विनायक फीचर्स)

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