अफगानिस्तान में तालिबानी (Taliban) प्रशासन ने अपनी अदालतों को लेकर एक ऐसा निर्देश जारी किया है, जिसने देश के भीतर ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तीखी बहस छेड़ दी है। तालिबान सरकार ने ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड फॉर कोर्ट’ के तहत नया आदेश जारी करते हुए कहा है कि मुल्ला और मौलवियों पर किसी भी तरह का आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा, चाहे अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो।
इस निर्देश के सामने आते ही अफगान समाज में आक्रोश और असंतोष देखने को मिल रहा है। आदेश के अनुसार, मुस्लिम धर्मगुरुओं को कानूनी कार्रवाई से पूरी तरह छूट दी गई है। यानी यदि कोई मुल्ला या मौलवी हत्या, हिंसा या किसी अन्य अपराध में भी संलिप्त पाया जाता है, तो उस पर केस दर्ज नहीं होगा और न ही उसे अदालत में पेश किया जाएगा।
इतना ही नहीं, इस नए कोड के आर्टिकल 9 के तहत अफगान समाज को चार अलग-अलग वर्गों में बांट दिया गया है। इस सामाजिक ढांचे में सबसे ऊपरी स्थान पर मुल्ला और मौलवियों को रखा गया है, जबकि बाकी आम नागरिक, गरीब और कमजोर वर्ग निचले पायदान पर होंगे। इससे कानून के तहत समानता का सिद्धांत पूरी तरह खत्म होता नजर आ रहा है।
निर्देश में यह भी साफ किया गया है कि अगर अन्य वर्गों के लोग किसी अपराध के दोषी पाए जाते हैं, तो उन्हें कड़ा दंड दिया जाएगा। एक ही अपराध के लिए अलग-अलग वर्गों के लोगों को अलग-अलग सजा दी जाएगी। यानी कानून अब अपराध नहीं, बल्कि अपराध करने वाले की हैसियत देखकर फैसला करेगा।
सोशल मीडिया पर इस फैसले को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। ‘देवबंदी इस्लामिक’ नाम के एक सोशल मीडिया अकाउंट ने दावा किया कि तालिबान प्रशासन ने अफगानिस्तान में चतुर्वर्ण व्यवस्था लागू कर दी है, जिसमें धर्मगुरुओं को सर्वोच्च और आम जनता को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया है।
नैशनल रजिस्टेंस फ्रंट (NRF) की मीडिया सेल ने भी तालिबान पर तीखा हमला बोला है। एनआरएफ ने कहा कि तालिबान ने गुलामी को कानूनी रूप दे दिया है। अब अदालतें लोगों को उनके सामाजिक दर्जे के आधार पर सजा सुनाएंगी, जिससे अमीर और उच्च वर्ग सुरक्षित रहेंगे, जबकि गरीबों और कमजोरों को कठोर दंड झेलना पड़ेगा।
मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि यह फैसला अफगानिस्तान में पहले से मौजूद भेदभाव को और गहरा करेगा। तालिबान प्रशासन पहले ही महिलाओं पर अत्याचार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी और अल्पसंख्यकों के दमन के लिए बदनाम रहा है। यह नया कानून उसी कड़ी का अगला कदम माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब तालिबान ने इस तरह के नियम लागू किए हों। जब पहली बार तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया था, तब भी कट्टर धार्मिक कानूनों के जरिए समाज को नियंत्रित किया गया था। 2021 में सत्ता में वापसी के बाद से एक बार फिर उसी दौर की यादें ताजा हो गई हैं।
हाल ही में तालिबानी न्याय व्यवस्था की क्रूरता का एक और उदाहरण सामने आया था, जब एक 13 वर्षीय किशोर को अपने परिवार के 13 सदस्यों की हत्या के आरोप में मौत की सजा सुना दी गई थी। इस सजा को लागू करने के दौरान करीब 80 हजार लोगों को गवाह बनाया गया था, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया था।
इस मामले में तालिबान के सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदजादा की मंजूरी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी। ऐसे में अब जब धर्मगुरुओं को कानून से ऊपर रखा जा रहा है, तो सवाल उठ रहा है कि तालिबान की न्याय प्रणाली वास्तव में इंसाफ पर आधारित है या केवल सत्ता और कट्टर सोच को मजबूत करने का जरिया बन चुकी है।


