सुशीम शास्त्री
जब एक समाज सड़कों पर है और दूसरा चुप—तो सवाल सिर्फ नीति का नहीं, चेतना का होता है
केंद्र सरकार के हालिया फैसले के बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से जुड़ा प्रकरण अब केवल शैक्षणिक सुधार या नियमों का विषय नहीं रह गया है। यह मुद्दा धीरे-धीरे सामाजिक संतुलन, प्रतिनिधित्व और भविष्य की दिशा से जुड़ता जा रहा है। देश के कई हिस्सों में इस फैसले के विरोध में सवर्ण समाज खुलकर सामने आया है—आंदोलन, ज्ञापन, प्रदर्शन और मुखर बयान। लेकिन इसी देश में ओबीसी और एससी समाज की संगठित, सशक्त और निर्णायक आवाज़ लगभग अनुपस्थित दिखती है। यही वह बिंदु है, जहाँ पूरे तंत्र का मनोबल टूटता है—और सवाल उठता है कि क्या खामोशी भी अब एक राजनीतिक विकल्प बन चुकी है?
यह समझना ज़रूरी है कि यूजीसी से जुड़े फैसले महज़ काग़ज़ी बदलाव नहीं होते। वे सीधे विश्वविद्यालयों की संरचना, शिक्षकों की नियुक्ति, आरक्षण की व्याख्या और उच्च शिक्षा में अवसरों की दिशा तय करते हैं। इतिहास गवाह है कि शिक्षा में नियमों का मामूली सा बदलाव भी सामाजिक संतुलन को वर्षों के लिए प्रभावित कर देता है। ऐसे में जब एक वर्ग अपने संभावित नुकसान को समझकर सड़क पर उतरता है, और दूसरा वर्ग—जिसका भविष्य उतना ही, बल्कि कई मामलों में उससे अधिक प्रभावित हो सकता है—चुप रहता है, तो यह चुप्पी सामान्य नहीं मानी जा सकती।
यहाँ सवाल यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत। सवाल यह है कि लोकतंत्र में आवाज़ किसकी सुनी जाती है? उत्तर साफ है—जिसकी आवाज़ होती है। लोकतंत्र में अधिकार स्वतः सुरक्षित नहीं रहते; उन्हें लगातार जागरूकता, संगठन और दबाव के माध्यम से सुरक्षित करना पड़ता है। सवर्ण समाज की सक्रियता इसी राजनीतिक यथार्थ की पहचान को दर्शाती है। वे जानते हैं कि नीति निर्माण में चुप्पी की कीमत चुकानी पड़ती है।
इसके विपरीत ओबीसी और एससी समाज की खामोशी कई स्तरों पर चिंता पैदा करती है। पहली चिंता यह कि क्या यह समाज वास्तव में आश्वस्त है कि उसके हित सुरक्षित हैं? दूसरी, और अधिक गंभीर चिंता यह कि क्या लगातार उपेक्षा ने इस समाज को सवाल पूछने से ही थका दिया है? जब नीतियाँ बनती हैं और प्रभावित वर्ग चुप रहता है, तो नीति-निर्माताओं को यह संदेश जाता है कि “सब ठीक है।” यही वह क्षण होता है, जब जिम्मेदार अधिकारियों, शिक्षाविदों और समाज के भीतर मौजूद ईमानदार आवाज़ों का मनोबल टूटता है।
यह भी सच है कि ओबीसी और एससी समाज संख्यात्मक रूप से विशाल है, लेकिन संगठनात्मक रूप से बिखरा हुआ है। अलग-अलग उपजातियाँ, क्षेत्रीय राजनीति और तात्कालिक लाभ की सोच—इन सबने एक साझा शैक्षणिक एजेंडा बनने नहीं दिया। नतीजा यह हुआ कि शिक्षा जैसे दीर्घकालिक मुद्दों पर भी तत्काल प्रतिक्रिया नहीं बन पाती। जबकि यही वर्ग सरकारी विश्वविद्यालयों, आरक्षण नीति और सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था पर सबसे अधिक निर्भर है।
यूजीसी प्रकरण हमें यह याद दिलाता है कि चुप्पी कभी तटस्थ नहीं होती। वह या तो यथास्थिति के पक्ष में खड़ी होती है, या फिर अनजाने में उसी को मजबूत करती है। जब एक वर्ग मुखर होकर विरोध करता है और दूसरा मौन साधे रहता है, तो सत्ता का झुकाव स्वाभाविक रूप से उसी ओर होता है जहाँ से दबाव आता है। यह लोकतंत्र का कठोर, लेकिन स्थापित सच है।
इस लेख का उद्देश्य किसी समाज को कटघरे में खड़ा करना नहीं है, बल्कि एक आत्ममंथन की ज़रूरत को रेखांकित करना है। ओबीसी और एससी समाज के बुद्धिजीवी, छात्र संगठन, शिक्षक संघ और जनप्रतिनिधि—सबको यह सोचना होगा कि क्या शिक्षा और नीति से जुड़े प्रश्नों पर उनकी भूमिका केवल दर्शक की रह जाएगी? अगर हाँ, तो भविष्य में होने वाले फैसलों की जिम्मेदारी भी उसी चुप्पी के खाते में जाएगी।
अंततः, यूजीसी प्रकरण एक चेतावनी है।यह चेतावनी सत्ता के लिए नहीं,
बल्कि समाज के लिए है।
जो समाज समय पर सवाल नहीं करता,उसका भविष्य अक्सर दूसरों द्वारा तय कर दिया जाता है।
और जब ऐसा होता है, तो सबसे पहले मनोबल टूटता है व्यक्ति का नहीं, पूरे लोकतांत्रिक तंत्र का।





