शरद कटियार
भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों में जातीय और सामाजिक भेदभाव का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है। वर्ष 2016 में हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहित वेमुला और वर्ष 2019 में पायल तंवी द्वारा जातीय भेदभाव के कारण आत्महत्या की घटनाओं ने इस समस्या को गंभीर रूप से उजागर किया। इन मामलों के बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च शिक्षण संस्थानों को भेदभाव रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए।
इन्हीं परिस्थितियों के आधार पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 13 जनवरी 2026 को यूजीसी बिल 2026 और उससे जुड़े नियम जारी किए। इस बिल का मूल उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या दिव्यांगता के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करना है। इसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांगजन को विशेष रूप से संरक्षित वर्गों में शामिल किया गया है।
यूजीसी बिल 2026 की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि धारा 3C के अंतर्गत पहली बार पिछड़े वर्ग (OBC) के सदस्यों को भी भेदभाव के पीड़ित की श्रेणी में शामिल किया गया है। इसके साथ-साथ संबंधित शिकायत समितियों में भी पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधियों को सदस्य बनाए जाने का प्रावधान किया गया है।
यूजीसी नियम 2026 के अनुसार यदि कोई छात्र या कर्मचारी जातीय भेदभाव से संबंधित शिकायत करता है, तो उच्च शिक्षण संस्थान में स्थापित समान अवसर केंद्र को 24 घंटे के भीतर उसकी रिपोर्ट तैयार करनी होगी। यदि मामला आपराधिक प्रकृति का पाया जाता है, तो संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध अभियोग पंजीकृत कर उसे जेल भेजने की कार्रवाई की जा सकती है। इस प्रक्रिया में पीड़ित की पहचान गोपनीय रखी जाएगी। नियमों में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि शिकायत बाद में झूठी साबित हो जाती है, तो शिकायतकर्ता के विरुद्ध किसी प्रकार की सजा का प्रावधान नहीं होगा।
बिल में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई विश्वविद्यालय या उच्च शिक्षण संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे संस्थानों को UGC की गतिविधियों में भाग लेने से रोका जा सकता है, डिस्टेंस लर्निंग और ऑनलाइन डिग्री कार्यक्रम बंद किए जा सकते हैं, यहां तक कि विश्वविद्यालय को यूजीसी की मान्यता सूची से हटाया भी जा सकता है।
हालांकि, यूजीसी बिल 2026 को लेकर कई तरह के विवाद भी सामने आए हैं। आलोचकों का कहना है कि झूठी शिकायतों की स्थिति में शिक्षक और छात्र अनावश्यक रूप से परेशान हो सकते हैं। यह आशंका भी जताई जा रही है कि मेहनत और मेरिट की बजाय जातीय श्रेणी को अधिक महत्व दिया जाएगा, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों के अवसर और सीमित हो सकते हैं।
कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि यह बिल कागजों पर भले ही अच्छा दिखता हो, लेकिन इसे जमीन पर लागू करना कॉलेज और विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए बेहद कठिन होगा। इसके अलावा यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि यह बिल यूजीसी की वेबसाइट पर उपलब्ध है, लेकिन अभी तक ई-गवर्नमेंट पोर्टल पर आधिकारिक रूप से अपलोड नहीं किया गया है।
आलोचकों का यह भी कहना है कि यूजीसी का उद्देश्य दलित और पिछड़े छात्रों के उत्पीड़न को रोकना होना चाहिए, न कि अन्य वर्गों के छात्रों में असुरक्षा की भावना पैदा करना। सभी छात्रों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए और किसी भी वर्ग के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। नियम बनाते समय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को सामाजिक संतुलन का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च शिक्षा में सुधार केवल कानून बनाने से नहीं होगा। इसके लिए शिक्षा को शोध का केंद्र बनाना होगा। अनुसंधान में निवेश बढ़ाना, विश्वस्तरीय रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना, साझा प्रयोगशालाएं और उत्कृष्ट शोध केंद्र स्थापित करना आवश्यक है। सरकार और निजी क्षेत्र के सहयोग से मजबूत रिसर्च इकोसिस्टम बनाना होगा, ताकि भारत आत्मनिर्भर और ज्ञान-आधारित राष्ट्र बन सके।
राजनीतिक दृष्टिकोण से भी इस बिल को देखा जा रहा है। जातीय जनगणना के अनुसार सामान्य वर्ग की आबादी लगभग 20 प्रतिशत, पिछड़े वर्ग की 50 प्रतिशत, अनुसूचित जाति की 22 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति की 8 प्रतिशत है। 28 नवंबर 2025 को कर्नाटक सरकार ने रोहित वेमुला एक्ट को विधानसभा में पेश करने की सिफारिश की थी। इसके बाद 17 जनवरी 2026 को राहुल गांधी द्वारा ओबीसी को उत्पीड़ित वर्ग में शामिल करने संबंधी बयान सामने आया। इसके जवाब में भाजपा द्वारा ओबीसी को यूजीसी बिल में शामिल किए जाने को राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
सोशल मीडिया पर इस बिल को लेकर मतभेद साफ दिखाई दे रहे हैं। स्वर्ण जातिगत संगठनों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है, जबकि पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के संगठन इसका समर्थन कर रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि सरकार को कास्ट-न्यूट्रल दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत सभी नागरिकों को समान सुरक्षा देनी चाहिए। साथ ही भेदभाव की शिकायत के साथ शपथ-पत्र को अनिवार्य किया जाना चाहिए, ताकि कानून का दुरुपयोग रोका जा सके।
अंततः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का लक्ष्य ऐसा शिक्षा तंत्र विकसित करना होना चाहिए, जहां ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और शोध के उत्कृष्ट केंद्र स्थापित हों और जो एक आत्मनिर्भर, समावेशी और शक्तिशाली भारत के निर्माण में सहायक बन सकें।

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