शरद कटियार
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) में नेतृत्व परिवर्तन का औपचारिक एलान होते ही यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि क्या यह बदलाव वास्तविक है या केवल प्रतीकात्मक। तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के बाद जिस तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, उन्होंने इस सवाल को और गहरा कर दिया है। खासकर, तेजस्वी यादव की बहन रोहिणी आचार्य की टिप्पणी ने इस फैसले के राजनीतिक और पारिवारिक निहितार्थों को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है।
रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया मंच X पर तेजस्वी यादव को शुभकामनाएं देते हुए जिस शब्दावली का इस्तेमाल किया, वह सामान्य बधाई संदेश से कहीं आगे जाती है। “कठपुतली बने शहजादा की ताजपोशी” जैसे वाक्य न सिर्फ व्यंग्यात्मक हैं, बल्कि वे यह संकेत भी देते हैं कि पार्टी में सत्ता का केंद्र अब भी पूरी तरह स्थानांतरित नहीं हुआ है। यह टिप्पणी दरअसल राजद की उस राजनीति पर सवाल उठाती है, जिसमें नेतृत्व परिवर्तन की घोषणा तो होती है, लेकिन निर्णयों की डोर पुराने नेतृत्व के हाथों में ही बनी रहती है।
राजद नेतृत्व का यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब पार्टी के सर्वोच्च नेता लालू प्रसाद यादव की सक्रिय भूमिका स्वास्थ्य और परिस्थितियों के चलते सीमित हो चुकी है। ऐसे में तेजस्वी यादव को आगे बढ़ाना संगठन के लिए स्वाभाविक कदम माना जा सकता है। पार्टी इसे नई पीढ़ी को कमान सौंपने और भविष्य की राजनीति के लिए खुद को तैयार करने के रूप में पेश कर रही है। लेकिन रोहिणी आचार्य की प्रतिक्रिया यह बताती है कि यह प्रक्रिया भीतर से उतनी सहज नहीं है, जितनी बाहर से दिखाई जा रही है।
यह पहली बार नहीं है जब किसी राजनीतिक दल में पारिवारिक मतभेद सार्वजनिक मंच पर आए हों, लेकिन राजद जैसे दल में, जहां परिवार और संगठन लंबे समय से एक-दूसरे में घुले-मिले रहे हैं, इस तरह की टिप्पणी का महत्व और बढ़ जाता है। यह बयान केवल भाई-बहन के बीच का मतभेद नहीं लगता, बल्कि वह पार्टी के भीतर शक्ति-संतुलन, निर्णय प्रक्रिया और नेतृत्व की स्वतंत्रता को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, रोहिणी आचार्य का बयान एक संकेत है कि राजद के अंदर नेतृत्व को लेकर एक अदृश्य खींचतान चल रही है। सोशल मीडिया के माध्यम से दिया गया यह संदेश पार्टी समर्थकों तक तो पहुंचा ही है, विपक्ष को भी एक नया हथियार मिल गया है। विपक्ष पहले से ही राजद पर वंशवाद और परिवार-नियंत्रित राजनीति के आरोप लगाता रहा है, और अब इस टिप्पणी को उसी विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
तेजस्वी यादव के सामने चुनौती केवल संगठन को मजबूत करने की नहीं है, बल्कि यह साबित करने की भी है कि वे केवल उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि स्वतंत्र निर्णय लेने वाले नेता हैं। कार्यकारी अध्यक्ष का पद उन्हें औपचारिक अधिकार जरूर देता है, लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि वे पार्टी की राजनीति और रणनीति में कितना आत्मनिर्भर हस्तक्षेप कर पाते हैं।
राजद के लिए यह क्षण आत्ममंथन का है। अगर नेतृत्व परिवर्तन को वास्तविक बनाना है, तो उसे सिर्फ पदों के पुनर्वितरण तक सीमित नहीं रखा जा सकता। संगठन के भीतर संवाद, मतभेदों का समाधान और नई पीढ़ी को वास्तविक निर्णय शक्ति देना अनिवार्य होगा। अन्यथा, इस तरह के बयान भविष्य में और तीखे रूप में सामने आते रहेंगे।
अंततः, रोहिणी आचार्य की टिप्पणी ने यह साफ कर दिया है कि राजद में बदलाव की प्रक्रिया अभी अधूरी है। यह केवल एक व्यक्ति की ताजपोशी का सवाल नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का प्रश्न है, जिसमें नेतृत्व विरासत से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक स्वायत्तता की ओर जाता है—या फिर उसी दायरे में घूमता रहता है। यह बहस सिर्फ राजद की नहीं है। यह भारतीय राजनीति में नेतृत्व, वंशवाद और वास्तविक सत्ता हस्तांतरण पर चल रही बड़ी बहस का एक और अध्याय है।


