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Sunday, January 25, 2026

यूपी की राजनीति में तीसरे मोर्चे की आहट तेज- पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक वोट बैंक पर नई सियासी लड़ाई

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति (UP politics) में 2027 विधानसभा चुनाव (assembly elections) से पहले नया सियासी प्रयोग आकार लेता दिख रहा है। पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को केंद्र में रखकर तीसरे मोर्चे की जमीन तैयार होने लगी है। इस कवायद की अगुवाई कर रहे हैं बसपा से भाजपा तक का सफर तय कर चुके पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्या, जिन्होंने अब अपना अलग राजनीतिक मोर्चा खड़ा कर दिया है।

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार स्वामी प्रसाद मौर्य न सिर्फ अपनी नई पार्टी को विस्तार दे रहे हैं, बल्कि पुराने बसपाई, सपा से नाराज़ नेता और सामाजिक संगठनों को एक मंच पर लाने की कोशिश में जुटे हैं। उनका दावा है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति अब बीजेपी बनाम सपा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि तीसरा मोर्चा निर्णायक भूमिका में आएगा।

इसी बीच कांग्रेस के भीतर भी हलचल बढ़ गई है। नासिमुद्दीन सिद्दीकी द्वारा कांग्रेस से दूरी बनाने की प्रक्रिया को इस नए मोर्चे से जोड़कर देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि कांग्रेस छोड़ो अभियान इस सियासी प्रयोग को और गति दे सकता है, जिससे पार्टी को बड़ा सामाजिक झटका लगने की आशंका है।

आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद चंद्रशेखर आज़ाद भी महरौली, पंचायत और जमीनी आंदोलनों के जरिए दलित वोट बैंक पर सीधा दावा ठोक रहे हैं। माना जा रहा है कि दलित मतों का एक बड़ा हिस्सा अब पारंपरिक दलों से खिसक सकता है।

हालांकि फिलहाल राजनीतिक लड़ाई भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच सीधी मानी जा रही है, लेकिन तीसरे मोर्चे की यह तैयारी पूरा चुनावी गणित बिगाड़ सकती है। पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं का साझा मंच बनता है तो इसका सीधा असर दोनों बड़े दलों पर पड़ेगा। सूत्रों की मानें तो इस सियासी खिचड़ी में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम भी संभावनाएं टटोल रही है।

अल्पसंख्यक वोट बैंक को मजबूत करने के लिए तीसरे मोर्चे से तालमेल की चर्चाएं अंदरखाने चल रही हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति अब सिर्फ सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि सामाजिक ध्रुवीकरण के नए प्रयोग की ओर बढ़ती दिख रही है।

स्वामी प्रसाद मौर्य का नया मोर्चा
कांग्रेस में टूट के संकेत दे रहा वहीं
दलित नेतृत्व की अलग पहचान
और अल्पसंख्यक राजनीति की नई रणनीति भी दिख रही है।
ये सभी संकेत बताते हैं कि 2027 का चुनाव पारंपरिक नहीं होगा। तीसरा मोर्चा अगर जमीन पर उतरता है, तो यह चुनावी रण को सीधे दो ध्रुवों से निकालकर त्रिकोणीय संघर्ष में बदल सकता है।

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