प्रशांत कटियार
उच्च शिक्षण संस्थानों में लंबे समय से चले आ रहे जातिगत भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा लागू किए गए उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026 को लेकर इन दिनों उत्तर प्रदेश समेत देशभर में तीखी बहस चल रही है। 15 जनवरी 2026 से लागू यह नियम अपने मूल में शिक्षा व्यवस्था को अधिक समावेशी और समान बनाने की कोशिश है, लेकिन इसे लेकर जिस तरह का विरोध खड़ा किया जा रहा है, उसने इसके वास्तविक उद्देश्य को हाशिये पर धकेल दिया है।
नए यूजीसी नियमों की सबसे अहम बात यह है कि अब अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के साथ साथ अन्य पिछड़ा वर्ग को भी जातिगत भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा में शामिल किया गया है। इसके तहत ओबीसी छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी उच्च शिक्षण संस्थानों में अपने साथ होने वाले भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करा सकेंगे। अब तक समान अवसर प्रकोष्ठ और शिकायत तंत्र मुख्य रूप से एससी एसटी तक सीमित था, जिससे ओबीसी समुदाय बड़ी संख्या में संस्थागत संरक्षण से बाहर रह जाता था। नया रेगुलेशन इस खाई को पाटने का प्रयास करता है।
नियमों के तहत प्रत्येक विश्वविद्यालय और कॉलेज में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए समान अवसर प्रकोष्ठ की स्थापना अनिवार्य कर दी गई है। इसके अलावा विश्वविद्यालय स्तर पर गठित की जाने वाली समानता समिति में ओबीसी, महिला, एससी, एसटी और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों को शामिल करना जरूरी होगा। यह समिति हर छह महीने में अपनी रिपोर्ट यूजीसी को भेजेगी, जिससे पहली बार संस्थानों की आंतरिक सामाजिक संरचना पर नियमित निगरानी संभव हो सकेगी।
इसके बावजूद अगड़ी जातियों से जुड़े कई संगठन और प्रभावशाली चेहरे इस नियम का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि इसका दुरुपयोग कर झूठे मामलों में फंसाया जा सकता है। हालांकि यह तर्क तब कमजोर पड़ जाता है, जब देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सामाजिक संतुलन पर नजर डाली जाती है। आजादी के बाद से एससी एसटी को आरक्षण मिला, ओबीसी को विश्वविद्यालयों में नामांकन में 1990 और फैकल्टी भर्ती में 2010 से आरक्षण दिया गया, फिर भी वंचित वर्गों की भागीदारी आज भी 15 प्रतिशत से अधिक नहीं है। इसके उलट विश्वविद्यालयों में कुलपतियों, प्रोफेसरों और शीर्ष प्रशासनिक पदों पर सवर्णों का वर्चस्व किसी से छिपा नहीं है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति भी इसी सामाजिक असंतुलन की तस्वीर पेश करती है, जहां विधानसभा में बड़ी संख्या में ब्राह्मण और ठाकुर विधायक मौजूद हैं और सत्ता के अहम पदों पर भी सवर्णों का दबदबा साफ दिखता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि समानता की दिशा में उठाया गया एक नियामक कदम आखिर किसे असहज कर रहा है।
यूपी में इस मुद्दे को लेकर विरोध इतना बढ़ गया है कि कुछ सवर्ण सांसद विधायक और उनके परिजन सार्वजनिक रूप से अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ सोशल मीडिया पर नाराजगी जता रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, ओबीसी समाज का एक बड़ा हिस्सा इस पूरे मुद्दे की बारीकियों से अनजान होते हुए भी इसे राजनीतिक चश्मे से देख रहा है। भाजपा को गालियां दिए जाने को ही वह अपने पक्ष में मान रहा है, जबकि असल सवाल शिक्षा संस्थानों में बराबरी और सम्मान का है।
यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि देश की कुल आबादी का बहुत छोटा हिस्सा ही विश्वविद्यालयों तक पहुंच पाता है। ऐसे में जो वर्ग वहां पहुंचता है, उसे भेदभाव से मुक्त वातावरण देना किसी भी लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी जिम्मेदारी है। एससी एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम लागू हुए 36 साल बीत चुके हैं, फिर भी दलित उत्पीड़न की घटनाएं थमी नहीं हैं। यह दर्शाता है कि केवल कानून बनना काफी नहीं, बल्कि संस्थागत स्तर पर सतर्क और जवाबदेह तंत्र जरूरी है।
यूजीसी का समानता नियम 2026 किसी एक वर्ग के खिलाफ नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण बनाने की कोशिश है। इसका विरोध करने के बजाय इसके क्रियान्वयन को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने पर जोर दिया जाना चाहिए। यदि वास्तव में उच्च शिक्षा को योग्यता, सम्मान और समान अवसर का केंद्र बनाना है, तो ऐसे नियमों का समर्थन ही देश और समाज के हित में होगा।
लेखक दैनिक यूथ इंडिया के स्टेट हेड हैं।


