प्रयागराज: ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य (Shankaracharya) स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (Swami Avimukteshwarananda) ने अपने खिलाफ जारी नोटिस को लेकर कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनसे शंकराचार्य होने का प्रमाण माँगना शिष्टाचार, परंपरा और धार्मिक मर्यादाओं के पूर्णतः विरुद्ध है। यह पूरी कार्रवाई उन्हें बदनाम करने की मंशा से की गई है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि शंकराचार्य पद कोई प्रशासनिक नियुक्ति नहीं है, बल्कि यह सनातन परंपरा, शास्त्र और अखाड़ा व्यवस्था के अंतर्गत निर्धारित होता है। ऐसे पद पर बैठे व्यक्ति से प्रमाण पत्र माँगना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह हिंदू धर्म की परंपराओं का भी अपमान है।
उन्होंने कहा, “मेरे पूरे जीवन, तप, साधना और शास्त्रीय अध्ययन को नज़रअंदाज़ कर इस तरह का नोटिस देना दुर्भावनापूर्ण है। यह कदम मेरी छवि धूमिल करने और सनातन परंपराओं को कमजोर करने के उद्देश्य से उठाया गया है।” शंकराचार्य ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि पूरे सनातन धर्म और उसकी परंपराओं से जुड़ा प्रश्न है। यदि आज शंकराचार्य से प्रमाण माँगा जाएगा, तो कल अन्य धार्मिक पदों और संतों को भी कटघरे में खड़ा किया जाएगा।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने ऐलान किया कि इस पूरे प्रकरण को लेकर वे न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे। उन्होंने कहा कि “हम कोर्ट जाएंगे और यह सिद्ध करेंगे कि यह नोटिस न केवल अवैध है, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला भी है।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ शक्तियाँ जानबूझकर धार्मिक विषयों को प्रशासनिक दायरे में घसीटकर सनातन समाज को भ्रमित करना चाहती हैं। ऐसे प्रयासों का डटकर विरोध किया जाएगा।
इस बयान के बाद संत समाज और सनातन संगठनों में भी रोष देखा जा रहा है। कई संतों ने इसे धार्मिक हस्तक्षेप और परंपराओं में दखल करार देते हुए शंकराचार्य के समर्थन में खड़े होने की बात कही है। फिलहाल यह मामला धार्मिक, सामाजिक और कानूनी तीनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन चुका है। आने वाले दिनों में न्यायालय में यह विवाद किस दिशा में जाता है, इस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।


