फर्रुखाबाद: माघ स्नान (Magh Snan) के मद्देनज़र प्रदूषण (Pollution) रोकने के उद्देश्य से शासन द्वारा गठित निगरानी समिति की रिपोर्ट के आधार पर विभिन्न जिलों में छपाई कारखानों को बंद रखने का रोस्टर जारी किया गया है। इसके तहत अलग-अलग त्योहारों के आसपास तथा पर्व-दिवसों में छपाई कारखानों को बंद रखने के आदेश दिए गए हैं।
इस निर्णय पर सवाल उठाते हुए अंतर्राष्ट्रीय हिंदू सेवा के जिला अध्यक्ष जितेंद्र अग्रवाल ने शासन के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन सचिव को पत्र भेजा है। पत्र में उन्होंने कहा है कि जनपद फर्रुखाबाद सहित आसपास के करीब 17 जिलों में नगर पालिकाओं के नाले, शिविर टैंक और घरों के सेप्टिक टैंकों का पानी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से गंगा में प्रवाहित हो रहा है। ऐसे में यदि प्रदूषण रोकना उद्देश्य है, तो कार्रवाई केवल छपाई कारखानों तक सीमित क्यों रखी गई?
जितेंद्र अग्रवाल ने तर्क दिया कि प्रदूषण केवल रंगीन औद्योगिक पानी से ही नहीं, बल्कि सीवर और टैंकों से निकलने वाले गंदे पानी से भी फैलता है।
नगर पालिकाओं और नगर निगमों के सीवर सीधे या परोक्ष रूप से गंगा में जा रहे हैं, जिससे गंगा जल लगातार दूषित हो रहा है। उन्होंने मांग की कि यदि छपाई कारखानों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जा रहे हैं, तो उसी तरह की कार्रवाई नगर पालिकाओं, नगर निगमों और सीवर प्रबंधन में लापरवाही बरतने वाली एजेंसियों पर भी की जाए।
समिति की भूमिका पर उठे सवाल
उल्लेखनीय है कि पिछले माह एक निगरानी समिति का गठन किया गया था, जिसमें प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी, नगर मजिस्ट्रेट, तहसील सदर, उपयुक्त उद्योग, परियोजना प्रबंधक, अधीक्षण अभियंता (विद्युत), सहायक पर्यावरण अभियंता, अवर अभियंता (अनुश्रवण), जिला पंचायत राज अधिकारी तथा नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी को शामिल किया गया था। इसी समिति की रिपोर्ट के आधार पर विभिन्न त्योहारों के आसपास छपाई कारखाने बंद करने के आदेश जारी किए गए हैं।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या प्रदूषण नियंत्रण की नीति संतुलित और सर्वसमावेशी है, या फिर कार्रवाई का दायरा केवल एक वर्ग तक सीमित कर दिया गया है। स्थानीय संगठनों का कहना है कि जब तक सीवर, नालों और टैंकों से हो रहे प्रदूषण पर समान रूप से कार्रवाई नहीं होगी, तब तक गंगा की स्वच्छता का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।


