अमृतपुर (फर्रुखाबाद): थाना अमृतपुर क्षेत्र के ग्राम आसमपुर (Village Assampur) स्थित बालू खनन पट्टे पर 21 जनवरी 2026 को हुई घटना को लेकर अब एक नया मोड़ सामने आया है। जहां एक ओर पट्टा संचालन से जुड़े लोगों ने इसे सुनियोजित हिंसा और तोड़फोड़ बताते हुए करीब 50 लाख रुपये के नुकसान का दावा किया है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय ग्रामीणों (villager) का कहना है कि यह युवक की मौत के बाद उपजा स्वाभाविक जनाक्रोश था, जिसे दबाने और ग्रामीणों को फंसाने के लिए खनन माफिया ने तोड़-मरोड़ कर पेश किया।
मौत के बाद भड़का आक्रोश
ग्रामीणों के अनुसार, 21 जनवरी की शाम बालू ढो रहे डम्परों की तेज रफ्तार और लापरवाही पहले से ही गांव के लिए खतरा बनी हुई थी। इसी क्रम में विजय पुत्र काशीराम निवासी मंझा की मडैया की डम्पर से कुचलकर मौत हो गई। युवक की मौके पर मौत के बाद गांव में भारी आक्रोश फैल गया। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने खनन कार्य रोकने और प्रशासन को बुलाने की मांग की थी, न कि किसी प्रकार की लूट या सुनियोजित तोड़फोड़ की।
ग्रामीणों का आरोप है कि खनन पट्टे से जुड़े प्रभावशाली लोगों ने घटना की जिम्मेदारी से बचने और अवैध खनन पर उठ रहे सवालों को दबाने के लिए ग्रामीणों पर ही हमला और तोड़फोड़ का आरोप मढ़ दिया। डम्परों, मशीनों और नकदी लूट की जो सूची तहरीर में दी गई है, उसे ग्रामीण बढ़ा-चढ़ाकर और मनगढ़ंत बता रहे हैं।
उनका कहना है कि यदि खनन पूरी तरह वैध और नियमों के अनुसार हो रहा था, तो—
भारी वाहनों की आवाजाही गांव के बीच से क्यों थी?
सुरक्षा मानकों और स्पीड कंट्रोल का पालन क्यों नहीं किया गया?
युवक की मौत के लिए जिम्मेदार वाहन और संचालक पर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर खनन पट्टों पर प्रशासनिक निगरानी की पोल खोल दी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते अवैध या अनियंत्रित खनन पर रोक लगाई जाती, तो एक युवक की जान नहीं जाती। अब आशंका जताई जा रही है कि एफआईआर के जरिए ग्रामीणों को डराने और आंदोलन को कुचलने की कोशिश की जा रही है।
ग्रामीणों ने मांग की है कि— युवक की मौत की निष्पक्ष जांच हो।
खनन पट्टे की वैधता, सुरक्षा मानकों और पर्यावरणीय नियमों की जांच कराई जाए।
निर्दोष ग्रामीणों को झूठे मुकदमों में न फंसाया जाए।
खनन माफिया और लापरवाह अधिकारियों की भूमिका की भी जांच हो।
यह मामला केवल तोड़फोड़ या नुकसान का नहीं, बल्कि एक आम ग्रामीण की जान, अवैध खनन और प्रशासनिक संरक्षण से जुड़ा हुआ है। यदि हर विरोध को “अराजकता” बताकर दबा दिया जाएगा, तो गांवों में बढ़ते असंतोष की जिम्मेदारी कौन लेगा?
अब देखना यह है कि अमृतपुर थाना पुलिस और जिला प्रशासन इस प्रकरण में निष्पक्षता दिखाते हैं या फिर एक बार फिर खनन माफिया की तहरीर ही सच मान ली जाएगी।


