शरद कटियार
आज समाज में एक ऐसी सच्चाई सामने है, जिस पर ईमानदारी (Honesty) से बात करना ज़रूरी हो गया है। कुछ लोग सार्वजनिक मंचों पर हिंदू रीति-रिवाज, ब्राह्मण परंपरा और सनातन (Sanatan) संस्कारों का विरोध करते हैं। वे स्वयं को प्रगतिशील, आधुनिक या किसी दूसरी व्यवस्था में आस्था रखने वाला बताते हैं। लेकिन जब बात अपने घर-परिवार की आती है, तो वही लोग उन्हीं परंपराओं को अपनाते हैं, जिनका वे विरोध करते रहे हैं।
विवाह हो, गृह प्रवेश हो या नामकरण—ब्राह्मण द्वारा मंत्रोच्चार कराया जाता है, अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लिए जाते हैं। मृत्यु के बाद भले ही कुछ लोग त्रयोदशी जैसे संस्कारों को न मानने की बात करें, लेकिन शांति पाठ, आत्मा की शांति और मानसिक संतुलन के लिए फिर वही वैदिक विधि अपनाई जाती है। इन कार्यों को करने वाले अधिकतर स्थानों पर आज भी ब्राह्मण ही होते हैं। कुछ जगहों पर गायत्री परिवार या गौर जाति से जुड़े लोग यह कार्य करते हैं, लेकिन वे भी वही मंत्र पढ़ते हैं, वही परंपरा निभाते हैं। यानी रूप बदल सकता है, पर आधार वही सनातन संस्कृति रहती है।
यहाँ सवाल किसी जाति की श्रेष्ठता या हीनता का नहीं है। यह सवाल ईमानदारी और स्पष्टता का है। इस संदर्भ में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के विचार बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। बाबा साहब ने जीवन भर पाखंड, दिखावे और दोहरे चरित्र का विरोध किया। वे कहते थे कि समाज की प्रगति के लिए सोच और आचरण में समानता आवश्यक है। उनका संघर्ष किसी व्यक्ति या परंपरा के खिलाफ नहीं था, बल्कि अन्याय, भेदभाव और ढोंग के खिलाफ था।
बाबा साहब ने यह भी स्पष्ट किया था कि सुधार का रास्ता ईमानदार आत्ममंथन से निकलता है, न कि सुविधानुसार विचार बदलने से। अगर कोई व्यवस्था आपको सही नहीं लगती, तो उसे पूरी स्पष्टता के साथ अस्वीकार कीजिए। लेकिन जब वही व्यवस्था संकट के समय आपको सहारा देती है, शांति देती है, तो उसका सार्वजनिक अपमान करना स्वयं अपने विचारों का अपमान है।
आज कई लोग कालबा, टीका, पूजा-पाठ या ब्राह्मण भूमिका पर टीका-टिप्पणी करते हैं। उन्हें पिछड़ा या अवैज्ञानिक कहा जाता है। लेकिन जब अपने परिवार की बात आती है, तब वही टीका लगवाते हैं, वही मंत्र सुनते हैं और वही संस्कार कराते हैं। यह दोहरी नीति न तो बाबा साहब की सोच के अनुरूप है और न ही किसी स्वस्थ समाज के लिए ठीक है। इससे नई पीढ़ी को यह संदेश जाता है कि सिद्धांत सिर्फ बोलने के लिए होते हैं, निभाने के लिए नहीं।
यह लेख किसी को किसी धार्मिक या सामाजिक बंधन में बाँधने के लिए नहीं है। बाबा साहब स्वयं कहते थे कि व्यक्ति को सोचने और चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। सनातन परंपरा भी यही कहती है कि आस्था स्वेच्छा से होनी चाहिए, दबाव से नहीं। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि सुविधा के अनुसार विचार बदले जाएँ।
या तो आप किसी परंपरा को स्वीकार करें और उसका सम्मान करें, या फिर उसे पूरी ईमानदारी के साथ अस्वीकार करें और उसी पर टिके रहें। परंपराओं का उपयोग ज़रूरत पड़ने पर करना और बाकी समय उनका उपहास उड़ाना—यह न तो प्रगतिशीलता है और न ही सामाजिक सुधार।
आज ज़रूरत है दिखावे की नहीं, साफ़ आचरण की संस्कृति की। बाबा साहब का संदेश भी यही था कि समाज तभी आगे बढ़ेगा, जब उसके लोग सोच और व्यवहार में ईमानदार होंगे। सनातन चेतना और सामाजिक न्याय—दोनों का सार यही है कि व्यक्ति जो बोले, वही जिए। यही सच्ची सामाजिक ईमानदारी है और यही एक मजबूत, जागरूक और संतुलित समाज की पहचान।


