
शरद कटियार
इंजीनियर युवराज की मौत कोई साधारण दुर्घटना नहीं है। यह घटना नोएडा जैसे कथित रूप से आधुनिक, हाईटेक और योजनाबद्ध शहर की प्रशासनिक विफलता, संवेदनहीनता और लचर आपदा प्रबंधन व्यवस्था का आईना है। जिस शहर को स्मार्ट सिटी, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश का हब बताकर प्रचारित किया जाता है, वहीं एक युवा इंजीनियर की जान जाना यह साबित करता है कि विकास की चमक के पीछे सुरक्षा और मानवीय संवेदनाएं हाशिये पर चली गई हैं।
इस घटना ने न केवल युवराज के परिवार को अपूरणीय क्षति दी है, बल्कि पूरे नोएडा प्रशासन और विशेष रूप से नोएडा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
दादरी विधायक तेजपाल नागर द्वारा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखा गया पत्र इस मामले को नई दिशा देता है। यह पत्र केवल एक जनप्रतिनिधि की औपचारिक चिट्ठी नहीं है, बल्कि नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ प्रत्यक्ष आरोप पत्र है।
तेजपाल नागर ने साफ शब्दों में कहा है कि इंजीनियर युवराज की मौत के लिए नोएडा प्राधिकरण जिम्मेदार है। यह आरोप इसलिए गंभीर है क्योंकि यह उस संस्था पर लगाया गया है, जो नोएडा की योजना, निर्माण, सुरक्षा और आपदा प्रबंधन की जिम्मेदार मानी जाती है। यदि वही संस्था अपने कर्तव्यों में विफल हो जाए, तो आम नागरिक की सुरक्षा किसके भरोसे रह जाती है?
हाईटेक शहर में लो-लेवल सुरक्षा
नोएडा को वर्षों से एक मॉडल सिटी के रूप में पेश किया गया है। चौड़ी सड़कें, ऊंची इमारतें, मेट्रो, कॉर्पोरेट टावर और बड़े आवासीय प्रोजेक्ट—सब कुछ कागजों और विज्ञापनों में शानदार दिखता है। लेकिन ग्राउंड रियलिटी यह है कि—ड्रेनेज सिस्टम कमजोर है,निर्माण स्थलों पर सुरक्षा मानकों का पालन नहीं होता, आपात स्थिति में रेस्क्यू की कोई स्थायी और त्वरित व्यवस्था नहीं है जिम्मेदारी तय करने की बजाय फाइलें आगे-पीछे की जाती हैं इंजीनियर युवराज की मौत ने इन सभी कमियों को एक ही घटना में उजागर कर दिया है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि एक इंजीनियर, जो खुद तकनीकी समझ रखता है, सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक की स्थिति क्या होगी?
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा और खतरनाक पहलू है रेस्क्यू सिस्टम की नाकामी। किसी भी आधुनिक शहर में यह अनिवार्य होता है कि आपदा या हादसे की स्थिति में तुरंत प्रशिक्षित टीम पहुंचे, आधुनिक उपकरण और तकनीक उपलब्ध हो। हर मिनट की कीमत समझी जाए, लेकिन नोएडा में अक्सर देखने को मिलता है कि हादसे के बाद पहले यह तय करने में वक्त चला जाता है कि कौन जिम्मेदार है, और तब तक हालात बेकाबू हो जाते हैं। विधायक तेजपाल नागर द्वारा राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल की स्थाई तैनाती की मांग इसी विफलता की स्वीकारोक्ति है।
जब तक बाहर से टीमें बुलवाई जाती हैं, तब तक बहुमूल्य समय निकल चुका होता है। युवराज की मौत भी इसी देरी की भेंट चढ़ी—यह सवाल अब प्रशासन से पूछा जाना चाहिए।
प्राधिकरण बनाम जवाबदेही
नोएडा प्राधिकरण पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वह निर्माण अनुमति देने में तेजी दिखाता है,
लेकिन निगरानी और सुरक्षा में ढिलाई बरतता है, हादसे के बाद जिम्मेदारी तय करने से बचता है, यदि जांच होती भी है, तो वह अक्सर निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रह जाती है। बड़े अधिकारी, जिन्होंने नीतिगत निर्णय लिए, सुरक्षित बच निकलते हैं। यही कारण है कि ऐसी घटनाएं बार-बार दोहराई जाती हैं। इंजीनियर युवराज की मौत के बाद भी यदि वही पुराना तरीका अपनाया गया—कमेटी, रिपोर्ट और फाइल—तो यह स्पष्ट होगा कि नोएडा प्राधिकरण ने कुछ नहीं सीखा। इस घटना का सबसे दुखद पहलू यह है कि युवराज अब कभी लौटकर नहीं आएगा। उसके सपने, उसकी मेहनत और उसका भविष्य—सब कुछ एक झटके में खत्म हो गया। सवाल यह नहीं है कि प्रशासन ने संवेदना व्यक्त की या नहीं, सवाल यह है कि— क्या यह मौत टाली जा सकती थी? यदि जवाब “हां” है, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक अपराध बन जाता है। समाज और मीडिया की जिम्मेदारी भी यहीं से शुरू होती है। यदि ऐसे मामलों को सिर्फ एक-दो दिन की खबर बनाकर छोड़ दिया गया, तो व्यवस्था कभी नहीं सुधरेगी।
मुख्यमंत्री के लिए परीक्षा की घड़ी
यह मामला अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए भी एक परीक्षा है। सरकार अक्सर सख्त प्रशासन और जीरो टॉलरेंस की बात करती है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या नोएडा प्राधिकरण के बड़े अधिकारियों पर कार्रवाई होगी? क्या रेस्क्यू और सुरक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार होगा? क्या एनडीआरएफ –एसडीआरएफ की स्थाई तैनाती पर गंभीरता से विचार होगा? यदि सरकार इस मामले में निर्णायक कदम उठाती है, तो यह एक मिसाल बनेगा। अन्यथा यह घटना भी कई अन्य हादसों की तरह फाइलों में दफन हो जाएगी।
नोएडा का भविष्य और सबक
इंजीनियर युवराज की मौत नोएडा के भविष्य को लेकर एक चेतावनी है। यदि विकास का मतलब केवल इमारतें, सड़कें और निवेश रह गया, और मानव जीवन की सुरक्षा पीछे छूट गई, तो ऐसा विकास खोखला कहलाएगा।
नोएडा को सच में आधुनिक शहर बनाना है तो—सुरक्षा मानकों को सख्ती से लागू करना होगा,प्राधिकरण की जवाबदेही तय करनी होगी,आपदा प्रबंधन को प्राथमिकता देनी होगी,और सबसे जरूरी, हर नागरिक के जीवन को मूल्यवान मानना होगा इंजीनियर युवराज की मौत कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि सिस्टम की चूक का परिणाम है। दादरी विधायक तेजपाल नागर का पत्र इस चूक को उजागर करता है और शासन को आईना दिखाता है। अब फैसला सरकार और नोएडा प्राधिकरण के हाथ में है या तो यह मौत बदलाव की वजह बनेगी, या फिर अगली किसी और युवराज की कहानी लिखी जाएगी। यह केवल एक संपादकीय नहीं, बल्कि एक सवाल है—क्या नोएडा में इंसानी जान की कीमत तय की जाएगी?






