प्रयागराज/लखनऊ: सनातन धर्म की हजारों वर्षों पुरानी परंपरा और मौजूदा सत्ता के बीच टकराव अब केवल वैचारिक बहस नहीं रहा, बल्कि सड़कों, प्रशासनिक आदेशों और नोटिसों तक पहुँच चुका है। माघ मेले (Magh Mela) में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े घटनाक्रम ने देशभर में यह सवाल खड़ा कर दिया है—क्या सनातन परंपरा अब सरकारी अनुमति की मोहताज हो गई है?
माघ मेले में टकराव की शुरुआत
विवाद की शुरुआत माघ मेले के दौरान उस समय हुई, जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के गंगा स्नान कार्यक्रम को लेकर प्रशासन ने रोक-टोक की। आरोप है कि उनके काफिले को स्नान घाट की ओर बढ़ने से रोका गया, जिससे स्थिति तनावपूर्ण हो गई।
शंकराचार्य समर्थकों का दावा है कि इस दौरान उनके शिष्यों पर लाठीचार्ज हुआ, वेदपाठी ब्राह्मण छात्रों के साथ धक्का-मुक्की की गई और धार्मिक मर्यादाओं की अनदेखी की गई। यह घटनाएँ सोशल मीडिया और संत समाज में तेजी से चर्चा का विषय बन गईं।
नोटिस से भड़का आक्रोश
मामला यहीं नहीं रुका। इसके बाद शंकराचार्य को नोटिस भेजे जाने की सूचना सामने आई, जिसमें उनके पद और पहचान को लेकर सवाल उठाए गए। इसे संत समाज और समर्थकों ने सीधे तौर पर “सनातन धर्म का अपमान” करार दिया।
समर्थकों का कहना है कि शंकराचार्य कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक शाश्वत परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे प्रमाण-पत्रों में बाँधना असंवैधानिक ही नहीं, अपमानजनक भी है।
घटनाक्रम पर विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि शंकराचार्य से सर्टिफिकेट पूछना पूरे सनातन धर्म का अपमान है। उन्होंने आरोप लगाया कि जो सत्ता की लाइन पर नहीं चलता, उसे नोटिस, ईडी और सीबीआई का डर दिखाया जाता है।
वहीं भाजपा और आरएसएस पर यह आरोप भी लगा कि वे हिंदुत्व को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि वास्तविक धार्मिक परंपराओं के सम्मान में विफल साबित हो रहे हैं।
समर्थकों का कहना है कि शंकराचार्य द्वारा गौ-हत्या, धार्मिक आचरण और राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा के तरीके पर उठाए गए सवाल सत्ता को असहज कर गए। इसी असहजता का परिणाम यह पूरा प्रशासनिक और राजनीतिक टकराव है।
संभल सहित अन्य मामलों का हवाला देते हुए संत समाज और विपक्षी नेताओं ने उम्मीद जताई है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट स्वतः संज्ञान लेकर धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करेंगे।
धार्मिक विद्वानों का मानना है कि यह विवाद किसी एक संत तक सीमित नहीं है। यह उस मूल प्रश्न से जुड़ा है कि क्या भारत में सदियों से चली आ रही सनातन परंपराएँ अब सत्ता की शर्तों पर चलेंगी, या सत्ता को परंपराओं की मर्यादा माननी होगी।
फिलहाल प्रशासन कानून-व्यवस्था का हवाला देकर अपनी कार्रवाई को सही ठहरा रहा है, जबकि शंकराचार्य समर्थक इसे आस्था और धर्म पर सीधा प्रहार मान रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और व्यापक होने की संभावना है, जो धर्म, राजनीति और लोकतंत्र के रिश्ते को नई परिभाषा दे सकता है।


